कांस के फूल

शरद ऋतु और त्योहारों के आगमन का दे रहा संकेत

धान के खेतों और नदी किनारों पर खिले काश के फूल बने आकर्षण का केंद्र

जमशेदपुर, 14 सितंबर।  मानसून की विदाई और शरद ऋतु के आगमन के बीच जमशेदपुर  शहर के बाहरी क्षेत्रों, धान के खेतों, नदी-नालों के किनारों, खाली मैदानों और गांवों में दूर-दूर तक फैले सफेद काश (कांस) के फूल लोगों का मन मोह रहे हैं।  हवा के झोंकों के साथ लहराते इन फूलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती ने सफेद चादर ओढ़ ली हो।

सुबह और शाम की सुनहरी धूप में काश के सफेद फूलों की चमक लोगों को आकर्षित कर रही है। फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह मौसम खास बन गया है।शहर के कई युवा और परिवार इन स्थानों पर पहुंचकर तस्वीरें और वीडियो बना रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार काश फूल मौसम परिवर्तन के संकेतक हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में  कहावत प्रचलित है, “काश फूले तो वर्षा बूढ़ी हो गई।”। बुजुर्गों का मानना है कि काश के फूल खिलने के बाद भारी बारिश की संभावना कम हो जाती है और मानसून विदा लेने लगता है। किसानों के लिए  यह एक प्राकृतिक संकेत है कि धान की फसल अब पकने की अवस्था में पहुंच रही है और खेतों में अतिरिक्त पानी की आवश्यकता नहीं रह जाती।

दुर्गा पूजा के आगमन का संकेत

धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी काश फूलों का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा  से पहले इन फूलों का खिलना शुभ माना जाता है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मान्यता है कि मां दुर्गा काश के फूलों से सजे मार्गों से धरती पर आती हैं। दुर्गा पूजा के दौरान इन फूलों का उपयोग सजावट और धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है।

जैव विविधता में भी भूमिका

वनस्पति विशेषज्ञों के अनुसार काश का पौधा (वैज्ञानिक नाम Saccharum spontaneum) घास की एक प्रजाति है, जो नदियों के किनारे और खुले क्षेत्रों में स्वतः उगती है। यह मिट्टी के कटाव को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा कई पक्षी और छोटे जीव-जंतु इसके बीच आश्रय प्राप्त करते हैं।
खुले नीले आसमान में तैरते सफेद बादल और धरती पर बिछी काश फूलों की सफेद चादर यह संदेश दे रही है कि अब वर्षा ऋतु विदा लेने वाली है और त्योहारों, खुशियों तथा उत्सवों का मौसम दस्तक दे चुका है।