2

देहरादून, 27 नवंबर । हिमालय की तलहटी में चारो ओर पहाड़ों से आच्छादित द्रोण नगरी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 71वें राष्ट्रीय अधिवेशन कल से शुरू हाेगा। यहां ज्ञान, शील और एकता के संदेश के साथ रानी अब्बक्का प्रदर्शनी का आयाेजन किया गया है। गुरुवार को परेड ग्राउंड पर बसाए गए बिरसा मुंडा नगर में रानी अब्बक्का प्रदर्शनी का शुभारंभ आयुर्विज्ञान केंद्र पतंजलि योगपीठ के अध्यक्ष आचार्य बालकृष्ण ने फीता काट कर किया।

रानी अब्बक्का प्रदर्शनी में देश के हर प्रांत के शौर्य-साहस के साथ लोक कला और लोक संस्कृति के रंग प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी के मुख्य गेट पर बाबा केदारनाथ मंदिर की आकृति में प्रवेश द्वार बरबस लाेगाें काे आकर्षित कर रहा है। प्रवेश करते ही एक लघु भारत आंखों के सामने नजर आता है। प्रदर्शनी में छात्र कलाकारों ने एक-एक चित्र पर मन की तुलिका से भारत के विभिन्नता में एकता के रंग भरे हैं।

रानी अब्बक्का प्रदर्शनी एक प्रदर्शनी ही नहीं बल्कि एक लघु भारत के विभिन्न पहलुओं को सामने आती है। राष्ट्रीय कला मंच ने यह प्रदर्शनी तैयार की है। प्रदर्शनी में उत्तराखंड, झारखंड, बिहारी, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों की लोक संस्कृति, परंपराओं, महापुरुषों के राष्ट्र निर्माण में योगदान को चि़त्रों में उकेरा गया है। अभाविप के अखिल भारतीय अधिवेशन का शुक्रवार को शुभारंभ होना है।

प्रदर्शनी को कई सुव्यवस्थित खंडों में बांटा गया है। अभाविप के विचार-वृक्ष, संगठन के राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय अभियानों, छात्र-चुनावों में संगठन की भूमिका व डिजिटल मीडिया के माध्यम से चल रही जनजागरण गतिविधियाें का विस्तृत विवरण प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी के राष्ट्रीय विषय खंड में स्वतंत्रता संग्राम के महानायक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की विभूतियां और विशेष रूप से वीरांगना रानी अबक्का के अदम्य साहस, राष्ट्ररक्षा के लिए उनके ऐतिहासिक संघर्ष और विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध उनके नेतृत्व को भी अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित किया गया है। रानी अबक्का को भारतीय अस्मिता, स्त्री-शौर्य और राष्ट्र-निष्ठा के सर्वाेच्च प्रतीकों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को प्रेरित करना है।

प्रदर्शनी में उत्तराखंड के वीर योद्धाओं तीलू रौतेली, माधो सिंह भंडारी और अन्य स्थानीय नायकों की गाथाओं को भी विशिष्ट स्थान दिया गया है। उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत, पर्वतीय जीवनशैली, पारंपरिक घरों के जीवन आकार मॉडल, आभूषण, कृषि उपकरणों और पहाड़ी वास्तुकला की झलकियां आगंतुकों को स्थानीय संस्कृक्ति से जोड़ रही है। उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों, मंदिरों, पौराणिक स्थानों, त्योहारों और लोकनृत्यों के साथ-साथ नंदा राजजात यात्रा, जागर परंपरा और विभिन्न स्थानीय देवताओं की सांस्कृतिक उपस्थिति का आकर्षक प्रदर्शन भी किया गया है।

प्रदर्शनी की केंद्रीय थीम, देवभूमि से राष्ट्रभूमि तक उत्तराखंड की 25 वर्ष की यात्रा व विजन 2047 के संदर्भ में राष्ट्रीय पुनर्जागरण पर आधारित है, जिसमें शंकराचार्य, गौरा देवी, स्वामी रामतीर्थ, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, माधो सिंह भंडारी, गोविंद बल्लभ पंत और उत्तराखंड की सास्कृतिक धरोहर पर आधारित विशिष्ट मंडप भी स्थापित किए गए हैं।