रांची, 09 अगस्त । विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में दो दिवसीय झारखंड आदिवासी महोत्सव-2026 का रविवार को आगाज हुआ। उद्घाटन समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी कार्यक्रम में मौजूद रहे।
मौके पर राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि जनजातीय समाज की समृद्ध संस्कृति, परंपराएं, जीवन-मूल्य एवं प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की चेतना की विशिष्ट पहचान हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल विकास तथा आर्थिक सशक्तीकरण के क्षेत्रों में निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
राज्यपाल ने कहा कि झारखण्ड का जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन का संदेश देता रहा है। आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब जनजातीय जीवन-दर्शन सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि विकास की गति को बनाए रखते हुए पर्यावरण एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने विगत दो वर्षों के दौरान झारखण्ड के सभी जिलों के सुदूरवर्ती ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों का भ्रमण किया है तथा वहाँ के लोगों से संवाद करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज अत्यंत परिश्रमी, ईमानदार, स्वाभिमानी तथा प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान की भावना रखने वाला समाज है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की अनेक सामाजिक विशेषताएँ पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
राज्यपाल ने जनजातीय समाज के लोगों से शिक्षा को जीवन का सबसे बड़ा साधन मानने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा आत्मविश्वास, सामाजिक परिवर्तन एवं राष्ट्र निर्माण का आधार है। उन्होंने भारत की राष्ट्रपति एवं झारखण्ड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मु के जीवन को शिक्षा की शक्ति का प्रेरक उदाहरण बताते हुए कहा कि सीमित संसाधनों एवं कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा संबल बनाया और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं।
राज्यपाल ने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जनजातीय समाज के सर्वांगीण विकास के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, बुनियादी सुविधाओं तथा जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। उन्होंने हजारीबाग से ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ के शुभारंभ तथा भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू में प्रधानमंत्री के आगमन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय एवं अविस्मरणीय योगदान दिया है। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, वीर बुधु भगत, सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव, फूलो-झानो, नीलाम्बर-पीताम्बर, जतरा उराँव सहित असंख्य जननायकों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को देशभर में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है।
राज्यपाल ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज की भूमिका को सदैव सम्मान के साथ स्मरण किया जाएगा। इस अवसर पर उन्होंने दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में लोकसभा सदस्य के रूप में लंबे समय तक उनके साथ कार्य करने तथा उन्हें निकट से जानने-समझने का अवसर उन्हें मिला। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन सरल, सहज एवं विनम्र व्यक्तित्व के धनी तथा जनजातीय समाज के अधिकारों एवं स्वाभिमान के लिए आजीवन संघर्षरत जननेता थे। झारखण्ड की अस्मिता, यहाँ के लोगों के अधिकारों तथा राज्य निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा में उनका योगदान सदैव स्मरण किया जाएगा।
राज्यपाल ने कहा कि झारखण्ड की जनसंख्या में जनजातीय समाज की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। उन्होंने कहा कि इनकी लोक परंपराएँ, कला, संस्कृति एवं जीवन-मूल्य देश की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं।
राज्यपाल ने कहा कि झारखण्ड राज्य संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत सम्मिलित है। संविधान ने अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा जनजातीय समुदायों के संरक्षण एवं कल्याण के संबंध में राज्यपाल को विशेष दायित्व सौंपे हैं। उन्होंने कहा कि इन संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन के प्रति वे पूर्णतः प्रतिबद्ध हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी महोत्सव को सिर्फ संस्कृति और परंपरा का उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, पहचान और अधिकारों के प्रति संकल्प का उत्सव बताया है। उन्होंने जल, जंगल, जमीन और पहचान की रक्षा को आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी बताया।
इससे पूर्व राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने महोत्सव परिसर में लगे प्रदर्शनी का अवलोकन किया।
महोत्सव में झारखंड की आदिवासी संस्कृति, कला, परंपरा और लोक विरासत को सामने रखा गया है। कार्यक्रम में पारंपरिक नृत्य और संगीत के साथ अलग-अलग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी।
इस बार महोत्सव में 600 से अधिक कलाकारों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, हो और खड़िया जनजातियों के कलाकार प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा पंचपरगनिया, कुरमाली, नागपुरी और खोरठा भाषाओं में भी नृत्य और संगीत कार्यक्रम होंगे।
महोत्सव में पारंपरिक खान-पान, आदिवासी परिधान और कला-शिल्प से जुड़े स्टॉल भी लगाए गए हैं। आदिवासी साहित्य और पुस्तकों के लिए पुस्तक मेला आयोजित किया गया है। इसके साथ ही फिल्म और वृत्तचित्र की स्क्रीनिंग, फैशन शो और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हो रहे है।
रात में ड्रोन शो भी आयोजित किया जाएगा। यह महोत्सव का खास आकर्षण रहेगा। वहीं, 10 अगस्त को शाम 4.30 बजे समापन समारोह आयोजित किया जाएगा।
