जयपुर, 31 जुलाई। राजस्थान की मायड़ भाषा राजस्थानी को उच्च शिक्षा में संस्थागत पहचान दिलाने और विश्वविद्यालयों में इसके स्थायी विभाग स्थापित करने की मांग को लेकर राजस्थान विश्वविद्यालय में चल रहा आंदोलन अब व्यापक भाषा आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। राजस्थानी भाषा के लिए आमरण अनशन पर बैठे छात्र नेता शुभम रेवाड़ ने अस्पताल में भी अनशन जारी रखने की बात कही है। उल्लेखनीय है कि तबीयत बिगड़ने पर पुलिस और प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में गुरुवार को अस्पताल में भर्ती करा दिया था।
शुक्रवार को अस्पताल से ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए रेवाड़ ने मायड़ भाषा के सम्मान के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही है। उनका कहना है कि राजस्थानी भाषा बचेगी तो राजस्थान की संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी।
रेवाड़ का कहना है कि राजस्थान के अधिकांश विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के लिए नियमित स्नातकोत्तर विभाग, पर्याप्त शोध व्यवस्था और स्थायी संकाय उपलब्ध नहीं है। ऐसे में हाल ही में राज्यपाल एवं कुलाधिपति के निर्देश के बाद प्रदेश के विश्वविद्यालयों में ‘शास्त्रीय मराठी भाषा अध्ययन केंद्र’ स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू होने से यह सवाल खड़ा हुआ है कि राजस्थान की अपनी मातृभाषा को उच्च शिक्षा में समान प्राथमिकता और संस्थागत आधार कब मिलेगा।
हालांकि मराठी भाषा के अध्ययन का विरोध नहीं किया जा रहा है, लेकिन छात्र नेताओं और राजस्थानी भाषा से जुड़े संगठनों का तर्क है कि दूसरे राज्यों की भाषाओं के अध्ययन के साथ राजस्थान की अपनी भाषा के लिए भी समान या उससे पहले मजबूत शैक्षणिक ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।
विदेशी भाषाओं के पाठ्यक्रम, लेकिन राजस्थानी के लिए सीमित अवसर
शुभम रेवाड़ का कहना है कि राजस्थान विश्वविद्यालय में फ्रेंच और स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं के नियमित पाठ्यक्रम संचालित हो रहे हैं, जबकि राजस्थानी भाषा के विद्यार्थियों को नियमित स्नातकोत्तर शिक्षा के पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहे। उनका दावा है कि राजस्थानी का अध्ययन सीमित और स्ववित्तपोषी पाठ्यक्रमों तक सिमटा हुआ है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और शोध के अवसर प्रभावित होते हैं।
उनके अनुसार, बड़ी संख्या में विद्यार्थी राजस्थानी भाषा में एमए, पीएचडी और शोध करना चाहते हैं, लेकिन पर्याप्त संस्थागत व्यवस्था नहीं होने के कारण उन्हें दूसरे विषयों या अन्य विश्वविद्यालयों की ओर जाना पड़ता है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मातृभाषा आधारित शिक्षा के प्रावधानों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब मातृभाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तब राजस्थान की अपनी भाषा को विश्वविद्यालयों में मजबूत आधार क्यों नहीं दिया जा रहा।
