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गोयनका बोले — राजस्थानी को सम्मान केवल भावनाओं से नहीं, संस्थागत व्यवस्था से मिले

बीकानेर, 31 जुलाई। राजस्थानी भाषा के मुद्दे पर राजस्थानी प्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष, समाजसेवी एवं उद्योगपति प्रहलाद राय गोयनका ने भी राजस्थानी भाषा की मान्यता और उसके शैक्षणिक विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया है।

उन्होंने अनशन पर बैठे शुभम रेवाड़ का समर्थ करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा राजस्थान की ऐतिहासिक चेतना, लोक परंपरा, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक पहचान की महत्वपूर्ण आधारशिला है। इसलिए इसके संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी केवल साहित्यकारों अथवा भाषा संगठनों की नहीं, बल्कि सरकार, विश्वविद्यालयों और समाज सभी की है। गोयनका के अनुसार, राजस्थानी भाषा को सम्मान देने का अर्थ केवल इसे बोलने या सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित रखना नहीं है। भाषा तभी मजबूत होगी, जब उसके लिए विश्वविद्यालयों में नियमित अध्ययन, उच्च शिक्षा, शोध, स्थायी विभाग, योग्य शिक्षक और रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। युवाओं को अपनी भाषा में आगे बढ़ने और उसी भाषा को अपने करियर तथा शोध का माध्यम बनाने का अवसर मिलना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि मराठी सहित देश की किसी भी भारतीय भाषा के अध्ययन और संरक्षण का विरोध नहीं होना चाहिए। भारत की प्रत्येक भाषा अपने इतिहास और संस्कृति के कारण सम्मान की अधिकारी है। लेकिन राजस्थान में दूसरी भारतीय भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाने के साथ यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राजस्थान की अपनी राजस्थानी भाषा को भी विश्वविद्यालयों में समान संस्थागत महत्व मिले। उनका मानना है कि राजस्थानी को लेकर वर्षों से चल रहे मान्यता के संघर्ष को केवल राजनीतिक मुद्दा न बनाकर शिक्षा, संस्कृति और युवाओं के भविष्य से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

गोयनका ने राजस्थानी भाषा के लिए विश्वविद्यालयों में स्थायी विभाग और शोध की मजबूत व्यवस्था विकसित करने तथा राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए व्यापक और सकारात्मक पहल की आवश्यकता बताई।

डॉ. शिवदान सिंह जोलावास बोले—राजस्थानी दस करोड़ कंठों का सम्मान

राजस्थानी भाषा के मुद्दे पर राजस्थानी मोट्यार परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शिवदान सिंह जोलावास ने कहा कि किसी दूसरी भाषा की कला, साहित्य और संस्कृति की तुलना राजस्थान की अपनी भाषा और संस्कृति से नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, राजस्थानी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता और करोड़ों लोगों की पहचान से जुड़ा विषय है। डॉ. जोलावास ने कहा कि एक ओर राजस्थान का नौजवान अपनी मायड़ भाषा के सम्मान, रोजगार और राजभाषा के अधिकार की मांग को लेकर सत्याग्रह कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यदि उसकी मूलभूत भाषाई आकांक्षाओं की अनदेखी होती है तो यह प्रदेश के करोड़ों लोगों की भावनाओं की उपेक्षा है।

उन्होंने कहा कि राजस्थानी मोट्यार परिषद् लंबे समय से राजस्थानी भाषा के लिए युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने तथा राजभाषा का दर्जा देने की मांग करती रही है। उनका कहना है कि देश की सभी मातृभाषाएं सम्मान की अधिकारी हैं, लेकिन राजस्थान की अपनी भाषा और यहां के युवाओं की आकांक्षाओं की अनदेखी कर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

डॉ. जोलावास ने राज्य सरकार से राजधर्म का पालन करते हुए राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए प्रभावी प्रयास करने तथा उच्च शिक्षा में राजस्थानी भाषा के स्थायी विभाग शुरू करने की मांग की।