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नगर निगम चुनाव की घोषणा में फिलहाल कोई बाधा नहीं

कोलकाता, 03 नवंबर । कोलकाता नगर निगम के वार्ड परिसीमन को चुनौती देने वाली माकपा की याचिका पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने शीघ्र सुनवाई से इनकार कर दिया है। एकल पीठ से अंतरिम राहत नहीं मिलने के बाद माकपा ने सोमवार को हाई कोर्ट की खंडपीठ का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, न्यायमूर्ति अरिंदम मुखर्जी और न्यायमूर्ति अर्जुन राय मुखर्जी की खंडपीठ ने तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की। अब फिलहाल कोलकाता नगर निगम चुनाव की घोषणा के रास्ते में कोई न्यायिक बाधा नहीं है।

राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद कोलकाता नगर निगम के वार्डों का पुनर्गठन किया गया है। इसके तहत वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 कर दी गई है। इस संबंध में जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए कसबा निवासी माकपा नेता दीपु दास ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि वार्डों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण में तार्किक संतुलन नहीं रखा गया। वार्डों की आबादी, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुविधा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किसी विशेष राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से वार्डों का पुनर्गठन किया गया है। साथ ही, वार्ड परिसीमन की सिफारिश करने के लिए नगर आयुक्त के अधिकारों की वैधता पर भी सवाल उठाया गया है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य की एकल पीठ में हुई थी। याचिकाकर्ता ने वार्ड परिसीमन संबंधी अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। एकल पीठ ने कहा कि वार्डों का प्रारूप प्रकाशित होने के समय याचिकाकर्ता ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी। अदालत ने गत 29 अक्टूबर को सभी पक्षों से हलफनामा मांगा था। मामले की अगली सुनवाई एक महीने बाद निर्धारित है।

एकल पीठ से अंतरिम राहत नहीं मिलने के बाद याचिकाकर्ता ने खंडपीठ में अपील की। उनके अधिवक्ता शमीम अहमद ने शीघ्र सुनवाई की मांग करते हुए दलील दी कि कोलकाता नगर निगम चुनाव की तारीखों की घोषणा कभी भी हो सकती है। चुनाव की घोषणा होने के बाद मामले की प्रासंगिकता समाप्त हो सकती है। इसलिए याचिका पर तत्काल सुनवाई जरूरी है।

हालांकि, खंडपीठ ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत का कहना था कि एकल पीठ में मामला पहले ही विचाराधीन है। ऐसी स्थिति में यदि चुनाव की घोषणा होती है, तो याचिकाकर्ता आवश्यकतानुसार अदालत का रुख कर सकते हैं। इसलिए फिलहाल मामले को पूजा अवकाशकालीन पीठ के समक्ष अत्यावश्यक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की जरूरत नहीं है।