गोंदल पुरा धरना 1

 “ हम जमींदार हैं, अडानी के नौकर नहीं ”

      शुभम राय

ओंकार समाचार

रांची/हजारीबाग, 30 मार्च।  झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 100 किलोमीटर दूर हजारीबाग जिले में स्थित गोंदलपुरा पिछले तीन साल से एक अनोखे और दृढ़ संघर्ष की मिसाल बना हुआ है। यहां के किसान रोज अपनी उपजाऊ जमीन पर पहरा देते हैं,  जंगली जानवरों के डर से नहीं, बल्कि अडानी एंटरप्राइजेज की प्रस्तावित कोयला खदान परियोजना के खिलाफ। यह आंदोलन सिर्फ जमीन बचाने का नहीं, बल्कि आजीविका, पहचान, पर्यावरण और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई है। लोगों का कहना है कि खेती यहां सिर्फ रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है।

क्या है विरोध का कारण

अडानी एंटरप्राइजेज को नवंबर 2020 में गोंदलपुरा ( गोंदुलपारा) नीलामी के माध्यम से कोल ब्लॉक आवंटित किया गया था। इस ब्लॉक में लगभग 176 मिलियन टन कोयले का भंडार है। परियोजना के तहत सैकड़ों हेक्टेयर भूमि, जिसमें बड़ी मात्रा में कृषि योग्य और वन क्षेत्र शामिल है,  कोयला खनन के लिए अधिग्रहीत करने की योजना है। गोंदलपुरा और आसपास के गाली,बालोदर, हाहे आदि गांवों के किसानों ने इसे अपनी जमीन, जल और जंगल पर हमला मानते हुए विरोध शुरू कर दिया। अप्रैल 2023 से चल रहा यह आंदोलन और संगठित रूप ले चुका है।  लोग पिछले 1000 से अधिक दिनों से हर रोज धरना स्थल पर इकट्ठा होते हैं। हर दिन करीब 100 लोग अपनी हाजिरी लगाते हैं। यह झारखंड या पूरे देश में शायद इकलौता ऐसा ग्रामीण आंदोलन है, जो इतने लंबे समय से एक स्थायी स्थान पर चल रहा है।

पहचान का सवाल

गोंदलपुरा की भूमि बहुफसली और अत्यंत उपजाऊ है। यहां साल के 12 महीने खेती होती है—धान, सब्जियां और अन्य फसलें। किसानों के पूर्वजों ने इस जमीन को सालों की मेहनत से उपजाऊ बनाया है। उनका डर है कि खनन शुरू होने पर यह भूमि हमेशा के लिए बंजर और प्रदूषित हो जाएगी। एक किसान ने कहा, “आज हम जमींदार हैं, अगर अडानी ने जमीन ले ली तो हम उसके नौकर बन जाएंगे।” आसपास के इलाकों में पहले खुले कोयला ब्लॉकों का अनुभव भी भयावह रहा है—वहां के गांव पूरी तरह बर्बाद हो गए, लोग विस्थापित हुए और आज उनका कोई अता-पता नहीं।

कटघरे में स्थनीय प्रशासन

ग्रामीणों का मुख्य आरोप प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और फर्जी ग्रामसभा का है। उन्होंने बताया कि जनवरी में परियोजना से जुड़े क्लियरेंस के लिए आयोजित ग्रामसभा में गोंदलपुरा के स्थानीय लोग नहीं, बल्कि बाहर के लोग शामिल थे। जब स्थानीय लोगों ने सभा में पहुंचने की कोशिश की, तो पुलिस ने उन्हें रोका और हिंसक भिड़ंत हो गई। वे प्रशासन पर अडानी की “गुलामी” करने का आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि कानून और ग्रामसभा की भावना का उल्लंघन हो रहा है।

राजनीति और विकास का दोहरा मापदंड

आंदोलनकारियों ने केंद्र सरकार पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है, “जब मोदी जी चुनाव में वोट मांगने आते हैं तो जल, जंगल, जमीन बचाने की बात करते हैं, लेकिन आज वही चीजें हमसे छीनी जा रही हैं।” वे मानते हैं कि कोल ब्लॉक से आम लोगों को न्यूनतम फायदा होगा, जबकि पूंजीपतियों को बड़ा लाभ। रोजगार के वादे पर उनका सीधा जवाब है— “हमारे यहां के युवा पढ़े-लिखे हैं। कई सेना, CRPF और सरकारी पदों पर काम कर रहे हैं। हमें अडानी की नौकरी नहीं चाहिए।”

व्यक्तिगत कीमत और महिलाओं की भागीदारी

इस संघर्ष की भारी कीमत कई लोगों ने चुकाई है। गोंदलपुरा के अशोक यादव पर पिछले तीन साल में 18 मामले दर्ज हुए हैं। उनकी 10 एकड़ जमीन परियोजना में जा रही है। उन्होंने कहा, “जब तक हमारे शरीर में खून का आखिरी कतरा बचा है, हम अडानी के खिलाफ इसी तरह लड़ते रहेंगे।”

आंदोलन में महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय है। वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रोज धरना स्थल पर पहुंचती हैं। एक महिला ने बताया कि उन्हें महीने में तीन दिन उपस्थित रहना होता है। अगर कोई दिन छूट जाए, तो 300 रुपये आंदोलन फंड में जमा करने पड़ते हैं।

संघर्ष से भरा है गोंदलपुरा का इतिहास

अडानी से पहले भी गोंदलपुरा में कोयला खदान खोलने की कोशिशें हो चुकी हैं। वर्ष 2006 में गोंदलपुरा कोल ब्लॉक  टेनूघाट विद्युत निगम लिमिटेड (TVNL) को आवंटित किया गया था। TVNL एक झारखंड सरकार की कंपनी थी और इसमें दामोदर वैली कॉरपोरेशन (DVC) को सहयोगी बनाया गया था। बाद में TVNL ने निजी कंपनी EMTA के साथ जॉइंट वेंचर भी बनाया ताकि परियोजना को आगे बढ़ाया जा सके। वर्ष 2012 में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन के लिए जन सुनवाई  आयोजित की गई, जो हजारीबाग टाउन हॉल में हुई। गांव से करीब 40 किलोमीटर दूर होने और भारी पुलिस सुरक्षा के बावजूद स्थानीय किसानों ने इस जन सुनवाई का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने इसे फर्जी और गैर-प्रतिनिधित्वपूर्ण बताया।

स्थानीय लोगों का विरोध 2006 से ही लगातार जारी रहा। उनकी मुख्य चिंता उपजाऊ कृषि भूमि, जल स्रोतों और पर्यावरण के नुकसान को लेकर थी। विरोध के कारण परियोजना बार-बार अटकती रही और आगे नहीं बढ़ पाई। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के 214 कोल ब्लॉकों को रद्द कर दिया, जिसमें गोंदलपुरा ब्लॉक भी शामिल था। इसके बाद यह ब्लॉक नीलामी के लिए आया और अंततः 2020-21 में अडानी एंटरप्राइजेज को आवंटित हो गया। इस तरह गोंदलपुरा के किसान पिछले 18-20 साल से अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अडानी का विरोध नया नहीं, बल्कि पुरानी लड़ाई का ही एक नया अध्याय है। आज का आंदोलन भी उसी परंपरा का हिस्सा है।