सरायकेला-खरसावां, 4 सितंबर । जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में सुवर्णरेखा नदी की रेत से सोना निकालने की परंपरा आदिवासी परिवारों के लिए आजीविका का प्रमुख साधन बनी हुई है।
स्थानीय लोगों के अनुसार मान्यता है कि सुवर्णरेखा नदी की रेत में सोने के कण पाए जाते हैं। इसी मान्यता के चलते हर सुबह पुरुष और महिलाएं कुदाल, खुरपी और लकड़ी की थाली लेकर नदी किनारे पहुंच जाते हैं। वे नदी के किनारे से मिट्टी, रेत और छोटे पत्थरों को निकालकर लकड़ी की थाली में जमा करते हैं। फिर उसे नदी के पानी से उसे बार-बार धोते हैं , घंटों की मेहनत के बाद रेत में छिपे सोने के महीन कण अलग कर पाते हैं। इन कणों को स्थानीय बाजारों, विशेषकर चांडिल के सोनारों को बेचकर प्रतिदिन 300 से 500 रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं।
स्थानीय आदिवासियों का कहना है कि वे पिछले कई दशकों से यही काम करते आ रहे हैं। रोजगार के अन्य साधनों की कमी और सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिलने के कारण वे इसी पारंपरिक कार्य पर निर्भर हैं। कई बार पूरे दिन की मेहनत के बाद केवल 200 से 350 रुपये ही मिल पाते हैं, लेकिन परिवार के भरण-पोषण के लिए यही उनकी आय का मुख्य स्रोत है।
गर्मी, बरसात और ठंड—हर मौसम में यह सिलसिला जारी रहता है।
सुबह से शाम तक नदी किनारे मेहनत करने वाले ये परिवार अपने साथ घर से भोजन लेकर आते हैं और दिनभर काम करने के बाद जो भी सोना मिलता है, उसे बेचकर घर लौटते हैं।
