डॉ. रिजवान का दावा, हिन्दुत्व की जड़ों को भूलना भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा
– हिन्दुत्व की जड़ों को भूलने की भूल न करे भाजपा, रणनीति पर छिड़ी वैचारिक बहस
लखनऊ, 08 अगस्त । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष और भाजपा के लगातार 12 वर्षों के केंद्रीय शासन के बीच हिन्दुत्व की दिशा, संगठन की प्राथमिकता और मूल समर्थकों की उपेक्षा को लेकर अधिवक्ता एवं प्रखर वक्ता डॉ. रिजवान अहमद ने संघ-भाजपा की रणनीति पर तीखी और वैचारिक बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया फेसबुक पर वीडियो वायरल कर अधिवक्ता रिजवान ने कहा कि हाल ही में उनकी आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ करीब सवा घंटे की बैठक हुई और उसमें मुसलमानों को संगठन के साथ जोड़ने पर चर्चा हुई। इस पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहले हिन्दुओं, युवाओं और दलितों को मजबूत आधार के रूप में जोड़िए, तभी हिन्दुत्व की शक्ति सुरक्षित रह पाएगी।
अधिवक्ता डॉ. रिजवान ने कहा कि हिन्दुत्व केवल चुनावी नारा नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्र चेतना का आधार है। जिन लोगों ने दशकों तक संगठन के लिए काम किया, कठिन समय में साथ खड़े रहे और वैचारिक संघर्ष लड़ा, यदि वही स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें तो यह किसी भी हिन्दुत्ववादी संगठन के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
60 प्रतिशत हिंदू समर्थन मिला तो बदल सकती है तस्वीर
रिजवान अहमद ने भाजपा को सलाह देते हुए कहा कि पार्टी को सबसे पहले अपने मूल हिन्दू आधार को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। यदि 2014 में भाजपा को लगभग 45-47 प्रतिशत हिन्दू समर्थन मिला था और बाद के वर्षों में उसमें कमी आई है तो पार्टी को यह समझना चाहिए कि उसका सबसे बड़ा राजनीतिक आधार हिन्दू समाज ही है। उनका दावा है कि यदि भाजपा को 60 प्रतिशत हिन्दुओं का समर्थन मिल जाए तो उसकी सीटों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है।
वीडियो में भाजपा की चुनावी स्थिति का उल्लेख करते हुए डॉ. रिजवान ने कहा कि 2014 में पार्टी के साथ लगभग 47 प्रतिशत हिन्दू मतदाता जुड़े थे। उनका दावा है कि यदि यह समर्थन बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंचता तो 2024 में भाजपा को कहीं अधिक सीटें मिल सकती थीं। ऐसी स्थिति में उत्तर प्रदेश में 400 में से 380 सीटें भाजपा की आतीं। उन्होंने कहा कि 303 से 240 तक पहुंचना चेतावनी है कि मूल हिन्दू आधार को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो भविष्य में और गिरावट संभव है।
विरोधियों की स्वीकृति के पीछे न भागें
डॉ. रिजवान ने कहा कि जिन वर्गों से वैचारिक समर्थन मिलने की उम्मीद नहीं है, उनकी स्वीकृति प्राप्त करने की चिंता छोड़ देनी चाहिए। जो विषय आपके मन में है कि वे हमारे पक्ष में बोलें, उसे भूल जाइए और अपने स्थायी समर्थकों पर ध्यान दीजिए। उन्होंने कहा कि संगठन को सबसे पहले हिन्दू समाज को वैचारिक रूप से संगठित करना चाहिए। युवा वर्ग में राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करना व दलित समाज को हिन्दुत्व की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान देना ही दीर्घकालीन शक्ति का आधार है। हिन्दुत्व का विस्तार अपने घर को मजबूत किए बिना संभव नहीं है।
कश्मीर, स्वीकार्यता और हिंदुत्व की बहस
डॉ. रिजवान ने वीडियो में कश्मीर, सेकुलर छवि और सामाजिक स्वीकार्यता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि कोई संगठन लगातार उन वर्गों की स्वीकृति पाने में लगा रहे जो वैचारिक रूप से उसके विरोधी रहे हैं तो वह अपने स्थायी समर्थकों से दूर हो सकता है। हिन्दुत्व की असली ताकत बाहरी प्रमाणपत्रों में नहीं बल्कि अपने समर्थकों के अटूट विश्वास में है। जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां से पूर्ण वैचारिक समर्थन की अपेक्षा करने के बजाय संगठन को अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग को मजबूत करने पर ऊर्जा लगानी चाहिए। उन्होंने जनसंख्या और दीर्घकालीन वैचारिक संघर्ष का भी उल्लेख किया। कहा कि हिन्दू समाज का संगठित रहना आवश्यक है।
मृगतृष्णा का उदाहरण
अधिवक्ता रिजवान ने भारतीय दर्शन के मृगतृष्णा सिद्धांत का उदाहरण देते हुए कहा कि हिरण दूर चमकती रेत को पानी समझकर दौड़ता रहता है, जबकि वास्तविक जल किसी और दिशा में होता है। इसी प्रकार यदि राजनीतिक संगठन केवल उन वर्गों की स्वीकृति पाने की दौड़ में लगे रहें जो शायद कभी उनके साथ न आएं तो वे अपनी सबसे मजबूत जड़ों को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि विस्तार आवश्यक है, नए लोगों को जोड़ना भी जरूरी है लेकिन इसकी कीमत मूल आधार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। पेड़ की शाखाएं तभी तक हरी रहती हैं जब तक जड़ों को जल मिलता रहे। जड़ें सूख गईं तो पूरा वृक्ष कमजोर पड़ जाता है।
संपूर्ण हिन्दू समाज साथ खड़ा हो जाए तो सत्ता अजेय
डॉ. रिजवान ने कहा कि यदि संपूर्ण हिन्दू समाज भाजपा के साथ खड़ा हो गया तो पार्टी को सत्ता में बने रहने में कोई दिक्कत नहीं होगी। अंत में उन्होंने कहा कि हर बड़े संगठन को स्वयं से यह पूछना चाहिए कि वह उन लोगों (मुस्लिम) को पाने की दौड़ में है जो शायद कभी उसके नहीं होंगे या उन लोगों का विश्वास भी उतनी ही गंभीरता से संभाल रहा है जिनकी निष्ठा ने उसे यहां तक पहुंचाया है। हिन्दुत्व की दीर्घकालीन शक्ति, संगठन का भविष्य और राजनीतिक स्थिरता इसी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करेगी।
