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सामाजिक समरसता एवं साम्‍प्रदायिक एकता के प्रतीक रामसा पीर    

 राजीव हर्ष 

महान अछूतोद्धारक , सामाजिक समरसता एवं  साम्‍प्रदायिक एकता के प्रतीक बाबा रामदेव कोटि कोटि जनता की आस्‍था के केंद्र हैं। योगी बालिनाथ के शिष्‍य बाबा रामदेव केवल राजस्थान ही नहीं गुजरात मध्यप्रदेश उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा  सहित कई प्रदेशों व पाकिस्तान में भी पूजनीय है। बाबा रामदेव को श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है। इनकी गणना चमत्कारिक और सिद्ध पुरुषों में की जाती है।

पंद्रहवीं सदी के आरम्‍भ में देश के हालात अत्‍यंत विकट थे। साम्‍प्रदायिक विद्वेष, जातिवाद, और अन्‍य धार्मिक एवं सामाजिक रूढि़यां अपने चरम पर थी। छुआछूत का बोलबाला था। ऐसे विकट काल में बाबा रामदेव ने अपने रिश्‍तेदारों की उपेक्षा और तिरस्‍कार को सहते हुए मेघवाल जाति की लडक़ी डालीबाई को सिद्ध परम्परा में दीक्षा देकर अपना सहयोगी बनाया। अछूतोद्धार के साथ – साथ उन्‍होंने कोढ़ी, अपंग, नेत्रहीन तथा असाध्‍य रोगों से ग्रसित लोगों तथा पीडि़त मानव की सेवा को सबसे बड़ा धर्म बताया। छुाअछूत का विरोध करने पर उनके रूढ़ीवादी रिश्तेदारों  ने उनका बहुत अपमान किया, विरोध किया लेकिन वे अपने मार्ग पर अडिग रहे। दया और करुणा के सागर बाबा रामदेव आजन्‍म जनता के सेवक बन दलित और पीडि़त लोगों की सेवा करते रहे। दयालु एवं चमत्‍कारी व्‍यक्तित्‍व के धनी, समाज के सभी वर्गों के लिए पूजनीय बाबा रामदेव हिन्दुओं के देव हैं और मुसलमानों के रामसा पीर।

जन्म :- पोकरण के राजा थे अजमल जी। वे द्वारकाधीश के अनन्‍य भक्‍त थे। उनके पुत्र नहीं था। पुत्र प्राप्ति के लिए उन्‍होंने अनेक जतन किये। एक दिन राजा अजमल जी कहीं जा रहे थे, उसी समय कुछ किसान हल बीज लेकर अपने खेतों की ओर जा रहे थे। किसानों ने अजमल जी को सामने से आते देखा तो वे रुक गए और अपने घरों की ओर लौटने लगे। अजमल जी ने किसानों से इसका कारण पूछा तो उन्‍होंने जवाब दिया कि वे खेत में बीजाई करने जा रहे हैं, और किसी शुभ कार्य के लिए जाते समय पुत्रहीन का सामने आना अपशकुन होता है, इसलिए हम घरों की ओर लौट गए। यह सुन कर अजमल जी बहुत दुखी हुए। उन्‍होंने अपने अराध्‍य द्वारिकाधीश की शरण में जाने का निर्णय किया। वे द्वारिका जा पहुंचे जहां द्वारिकाधीश ने उन्‍हें साक्षात दर्शन देकर कहा कि मैं तुम्हारा दुख जानता हूँ। मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ, तेरी हर इच्छा पूरी करूँगा। अजमल जी ने कहा हे प्रभु मुझे आपके समान पुत्र चाहिये। तब भगवान द्वारकाधीश ने कहा- मैं तुम्हे वचन देता हूँ कि मैं स्वयं तुम्‍हारे घर पुत्र बनकर आउंगा। अजमल जी ने पूछा कि हमें कैसे पता चलेगा कि आप हमारे घर आए हैं। द्वारिकाधीश बोले, जिस रात मैं तुम्‍हारे घर आउंगा उस रात सभी मंदिरों में घंटियां बजने लगेंगी ,पानी दूध में बदल जाएगा। महल के मुख्य द्वार से पालने तक कुमकुम के पगलिये नजर आयेंगे।

विक्रम संवत 1409 में भादो महीने में दूज के दिन द्वारिकाधीश अजमल जी के घर पालने में अवतरित हुए इसके साथ ही सभी मंदिरों में घंटियां बजने लगीं, सारा नगर रौशनी से जगमगाने लगा। महल के मुख्य द्वार से लेकर पालने तक कुमकुम के पदचिन्ह बन गए। अजमल जी समझ गए कि भगवान द्वारिकाधीश ने उनके पुत्र के रूप में अवतार ले लिया है।

दलितों के मसीहा साम्‍प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक :-  बाबा रामदेव तत्‍कालीन समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ थे। उन्‍होंने छुआ छूत का विरोध किया। वे गांव गांव जाते और ज्ञान से वंचित दलितों को अपनी वाणियों के माध्‍यम से अघ्‍यात्‍म का ज्ञान देते थे। वे हिंदू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे।

रूणिचा की स्थापना :- बाबा रामदेव ने पोकरण से कुछ दूर उत्तर दिशा में एक गांव बसाया जिसका नाम रूणिचा रखा। बहुत से लोग रूणिचा में आकर बसने लगे। थोड़े ही समय में रूणिचा सुन्दर और रमणीय गांव बन गया।

विवाह :-  रूणिचा गांव बसाने के लगभग एक साल बाद संवत् 1426  में अमर कोट के ठाकुर दल जी सोढ़ा की पुत्री नैतलदे के साथ रामदेव जी का विवाह हुआ।

राम सरोवर :– रामदेवजी ने क्षेत्र के लोगों की सुविधा के लिए विक्रम संवत् 1439 में एक तालाब खुदवाया जिसे आज ‘रामसरोवर’ के नाम से जाना जाता है। यह सरोवर बाबा रामदेव मंदिर के पीछे की तरफ लगभग 150 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है एवं 25 फुट गहरा है। इसके पश्चिम छोर पर आश्रम व पाल के उत्तरी सिरे पर बाबा रामदेवजी की समाधि है। पाल के इसी हिस्‍से में भक्‍त शिरोमणि डाली बाई की भी समाधि है

लोक मानस में बाबा रामदेव चमत्‍कारी व्‍यक्तित्‍व के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके चमत्‍कारों को आमजन की भाषा में पर्चा कहा जाता है। उनके भक्‍त इन पर्चों को गा कर बाबा की महिमा का बखान करते हैं। बाबा के चमत्‍कारों में से कुछ का वर्णन यहां कर रहे हैं।

माता को परचा :- एक दिन बालक रामदेव व वीरमदेव अपनी माता की गोद में खेल रहे थे  तभी चूल्‍हे पर रखे बर्तन से दूध ऊफन कर बाहर आने लगा। माता मैणादे ने दूध के बर्तन को चूल्‍हे से उतारने के लिए रामदेवजी को गोदी से नीचे उतारने का प्रयास किया तभी रामदेवजी ने अपना हाथ चूल्‍हे की ओर करके दैवी शक्ति से बर्तन को चूल्हे से उतार दिया।

कपड़े का घोड़ा उड़ाया :- एक बार बालक रामदेव ने घोड़े की  मांग की इस पर राजा अजमल उसे एक दर्जी के पास लेकर गये और उसे कपड़े का घोड़ा बनाने को कहा। घोड़ा बनाने के लिए अजमलजी ने दर्जी को मखमली कपड़ा दिया। दर्जी ने थोड़े से कपड़े से घोड़ा बनाया और बाकी कपड़ा अपने पास ही रख लिया। बालक रामदेव को दर्जी की कारस्‍तानी का पता चल गया। उसे सबक सिखने के लिए रामदेव घोड़े को लेकर आकाश में चले गए। इस पर राजा ने दर्जी को जेल में डालने के आदेश दे दिये। कुछ समय बाद बालक रामदेव घोड़े के साथ आये। दर्जी ने अपनी गलती स्‍वीकार करते हुए बाबा रामदेव से गुहार की। रामदेव ने दया दिखाते हुए उसे माफ़ कर दिया । इस पर्चे को याद करते हुए आज भी श्रद्धालु बाबारामदेव को कपड़े का घोड़ा चढ़ाते हैं।

भैरव राक्षस के आतंक से मुक्ति :- कहते हैं कि पोकरण के निकट भैरव राक्षस रहता था। भैरव राक्षस का आतंक पोकरण क्षेत्र में 36 कोष तक फैला हुआ था। वह इंसानों की गंध पाकर उन्‍हें ढूंढता और  उनका वध कर देता था। उसके आतंक के चलते लोग पोकरण छोड़ कर भाग गए, पोकरण सूना हो गया। भैरव राक्षस बाबा रामदेव के तपस्‍वी गुरु बालीनाथजी से डरता था। एक दिन बाबा रामदेव बालीनाथजी के धूणे में गुदड़ी में छुपकर बैठ गए। कुछ ही देर में भैरव राक्षस आया उसने इंसान की गंध पा कर गुदड़ी खींची। गुदड़ी में बाबा रामदेवजी को देखकर वह भागने लगा और कैलाश टेकरी के पास गुफा में जा घुसा। रामदेवजी ने वहीं उसका वध कर दिया था। कुछ लोग मानते हैं कि भैरव राक्षस ने बाबा रामदेव के दिव्‍य व्‍यक्तित्‍व के आगे आत्‍म समर्पण कर दिया और वह मारवाड़ छोड़ कर कहीं और चला गया। दिया। भैरव राक्षस से मुक्ति मिलने के बाद पोकरण के उजड़े इलाके फिर से बस गए।

बोहिता को परचा व परचा बावड़ी :- कहते हैं कि एक बार बाबा रामदेव ने अपने दरबार में बैठे सेठ बोहिताराज को परदेस जा कर धन कमाने को कहा। परदेस जाने की बात सुन सेठ घबराया तब बाबा रामदेव ने उसे हर संकट में मदद करने का आश्‍वासन दिया। बाबा के आश्‍वासन के बाद बोहिताराज समंदर पार परदेस गया। परदेस में उसने खूब धन कमाया। एक ही साल में वह हीरों का बहुत बड़ा व्‍यापारी बन गया। परदेस में रहते-रहते बोहिताराज को अपने परिवार की याद सताने लगी। उसने रुणीचा लौटने का निश्‍चय किया। बोहिताराज ने परदेस में कमाया सारा धन नाव में लदवाया। बाबारामदेव को भेंट देने के लिए हीरों का हार खरीदा और रुणीचा के लिए रवाना हुआ। रास्‍ते में बोहिताराज के मन में लालच आया वह सोचन लगा कि बाबा रामदेव इस कीमती हार का क्या करेंगे, इसके साथ ही वह रूणिचा के बजाय किसी बड़े शहर में रहने और बड़ा सा महल बनाने के बारे में सोचने लगा। तभी समुद्र में तूफानी लहरें उठने लगी, तेज हवाओं से नाव के पर्दे फट गए। नाविकों ने कहा सेठ जी तूफान बहुत भयंकर है अब नाव का डूबना और हमारा मरना निश्चित है। घबराए बोहिताराज ने अनेक देवी देवताओं को याद किया, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की तब उसे बाबा रामदेव जी का दिया वचन याद आया। सेठ ने बाबा रामदेव को पुकारा। उस समय बाबा रामदेव जी रूणिचा में अपने भाई वीरमदेव जी के साथ बैठे थे। वहीं बैठे बैठे उन्होंने बोहिताराज की पुकार सुनी और अपनी भुजा पसार कर बोहिताराज की नाव को किनारे पर लगा दिया। कहते हैं कि रामदेव जी के हाथ समुद्र के पानी से भीग गए थे। नाव को अचानक किनारे लगी देख सेठ और सभी नाविक चकित हो गए। सेठ तो जानता था कि ये किस की कृपा से हुआ है उसने नाविकों  से कहा कहा जिसकी रक्षा बाबा रामदेव करते हैं उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। गांव पहुंचने के बाद सेठ ने गांव वालों को सारी बात बतायी। सेठ ने दरबार में जाकर बाबा रामदेव से क्षमा मांगी और उनसे पूछा कि परदेस से कमा कर लाए धन को कहाँ खर्च किया जाय। इस पर बाबारामदेव ने सेठ को रूणिचा में एक बावड़ी खुदवाने को कहा। बाबा ने कहा कि इस बावड़ी का पानी मीठा और गंगाजल के समान पवित्र होगा, लोग इसे परचा बावड़ी के नाम से पुकारेंगे। वह परचा बावड़ी रूणिचा में आज भी विद्यमान है।

पीरों को परचा :- बाबा रामदेव की ख्‍याति सुन कर दूर दूर से लोग रूणिचा आने लगे। मौलवियों और पीरों ने भी बाबा की चर्चा सुनी। उन्‍होंने मक्‍का में रहने वाले अपने से बड़े पीरों को खबर दी कि हिन्दुओं में एक ऐसे महान पीर पैदा हुए हैं जो मरे हुए प्राणी को जिन्दा कर देते हैं, अन्धे को आँखे देते हैं, अतिथियों की सेवा करना ही अपना धर्म समझते हैं। खबर पहुचते ही पाँच पीर मक्का से रवाना हुए। कुछ दिनों में वे  रूणिचा के निकट पहुँचे। संयोग से उनकी मुलाकात बाबा रामदेव से हो गई।पीरों ने बाबा रामदेव से रुणिचा का पता पूछा, रामदेवजी ने कहा कि सामने जो गांव दिखाई दे रहा है वही रूणिचा है। उन्‍होंने पीरों से रूणिचा आने का कारण पूछा । वे बोले हमें यहां रामदेव जी से मिलना है। तब बाबा रामदेव बोले मैं ही हूँ रामदेव कहिये मैं आपकी क्‍या सेवा कर सकता हूं। बाबा रामदेव पांचों पीरों को अपने साथ ले गए । उनकी खूब आवभगत की। जब भोजन का समय हुआ तो पीर बोले हम अपने ही कटोरे में भोजन करते हैं और वे हम मक्‍का में भूल आए हैं। इस पर बाबा रामदेव ने कहा कि अगर ऐसा है तो मैं आपके कटोरे मंगा देता हूँ। बाबारामदेव ने अपना हाथ लम्बा किया और एक ही पल में पाँचों कटोरे पीरों के सामने रख दिये। अपने कटोरों को देख  पीरों को रामदेव जी महानता पर विश्वास हो गया। वे बाबा के विचार और उनके आचरण से बहुत प्रभावित हुए। उन्‍होंने कहा हम पीर हैं और आप हम से भी महान पीर हैं। आज से आपको दुनिया रामापीर के नाम से जानेगी।

रानी नेतल को परचा :एक बार रानी नेतलदे ने रामदेवजी से कहा- आप तो सिद्धपुरुष हैं, बताइए मेरे गर्भ में पुत्र है या पुत्री?’ इस पर रामदेवजी ने कहा कि तुम्हारे गर्भ में पुत्र है और उसका नाम सादा रखना है। रानी का संशय दूर करने के लिए रामदेवजी ने अपने पुत्र को आवाज दी। इस पर अपनी माता के गर्भ से ही वह पु‍त्र बोल उठा। रामदेवरा से 25 किमी दूर उनके नाम से ‘सादा’ गांव बसा हुआ है।

सेठ दलाजी को परचा :– मेवाड़ के एक गांव में एक सेठ दलाजी रहते थे। दला जी के पास धन-संपत्ति तो खूब थी, लेकिन कोई संतान नहीं थी। एक साधु के कहने पर वह बाबा रामदेव की पूजा करने लगे। सेठ ने मनौती मांगते हुए कहा कि पुत्र होने पर एक मंदिर बनवाऊंगा। इस मनौती के 9 माह पश्चात ही उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया । सेठ का पुत्र जब 5 वर्ष का हो गया तो सेठ और सेठानी उसे साथ लेकर रुणिचा के लिए रवाना हो गए। एक लुटेरा स्‍वयं को बाबारामदेव का भक्‍त बता कर उनके साथ हो लिया। चलते – चलते रात हो गई। मौका मिलते ही लुटेरे ने अपनी असलियत दिख दी। उसने सेठ की हत्‍या कर उसका सारा धन हड़प लिया। निर्जन वन में असहाय सेठानी अपने बच्चे को साथ लिए विलाप करने लगी। उसने रामदेवजी को पुकारा। अबला की पुकार सुन बाबा रामदेव अपने लीले घोड़े पर सवार होकर तत्काल वहां पहुंचे। बाबा रामदेव ने अबला से अपने पति का कटा हुआ सर गर्दन से जोड़ने को कहा। सेठानी ने जब ऐसा किया तो सर जुड़ गया और दलाजी जीवित हो गए। बाबा का यह चमत्कार देख सेठ-सेठानी बाबा के चरणों में गिर पड़े। उसी स्थल पर दलाजी ने बाबा का एक भव्य मंदिर बनवाया।

नेत्रहीनसाधु को परचा :-  सिरोही से श्रद्धालुओं का एक जत्‍था रुणिचा के लिए रवाना हुआ इस जत्‍थे में  एक नेत्रहीन साधु भी था। रात होने पर सभी लोग एक गांव में विश्राम करने के लिए रुके । आधी रात के वक्‍त सभी लोग आगे की यात्रा पर निकल गए। नेत्रहीन साधु वहीं छूट गया। जब उस साधु की नींद  खुली तो उसने खुद को अकेला पाया। वह दुखी होकर विलाप करने लगा। बाबा रामदेव तुरंत उसके पास पहुंचे। उन्होंने साधु के सिर पर हाथ रखकर उसके नेत्र खोल दिए और उसे दर्शन दिए।

समाधि :- मान्यता है कि विक्रम संवत 1442  भादो मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को बाबा रामदेव ने  जीवित समाधि ली थी। बाबा रामदेव ने बड़े बुजुर्गों को प्रणाम किया तथा सबने रामदेव जी का अन्तिम पूजन किया। रामदेव जी ने समाधी में खड़े होकर सब को अपने अन्तिम उपदेश देते हुए कहा कि मेरे समाधि पूजन में किसी तरह का भेद भाव मत रखना। रुणिचा में बाबा ने जिस स्‍थान पर समाधि ली, उस स्‍थान पर बीकानेर के राजा गंगासिंह ने भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।  मंदिर में बाबा की समाधि के अलावा उनके परिवार वालों की समाधियां भी हैं। मंदिर परिसर में बाबा की मुंहबोली बहन डाली बाई की समाधि,  डालीबाई का कंगन एवं राम झरोखा भी हैं।

डाली बाई का कंगन :-  बाबा रामदेव के मंदिर में डाली बाई की समाधि के पास ही पत्थर का बना डाली बाई का कंगन है। मान्यता है कि इस कंगन के अंदर से निकलने पर सभी रोग-कष्ट दूर हो जाते हैं। मंदिर आने वाले श्रद्धालु इस कंगन के अंदर से अवश्य निकलते हैं।

डाली बाई का जाल :- डाली बाई का जाल वह पेड़ है जिसके नीचे बाबा रामदेव को डाली बाई मिली बाबा रामदेव ने उसे अपनी मुंहबोली बहन बना लिया। । यह स्थल मंदिर से 3 किलोमीटर दूर स्थित है।

गुरु बालीनाथजी का धूना :-  रामदेवजी के गुरु बालीनाथजी का धूणा पोकरण में है। बाबा ने बाल्यकाल में यहीं शिक्षा प्राप्त की थी। शहर के पश्चिमी छोर पर सालमसागर एवं रामदेवसर तालाब के बीच स्थित गुरु बालीनाथ के धूणे पर प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु शीष नवाने आते हैं।

भैरव राक्षस की गुफा :- मंदिर से लगभग 12 किलोमीटर दूर पोकरण के निकट भैरव राक्षस की गुफा  है। श्रद्धालु रामदेवजी की पूजा के बाद भैरव राक्षस को बाकला चढ़ाते हैं।

पंच पीपल :-  मक्‍का से आए पीरों ने बाबा रामदेव से मुलाकात के दौरान परचे स्‍वरूप 5 पीपली लगाई थी, जो आज भी वहां विद्यमान है। यह रामदेवरा से 12 किलोमीटर दूर एकां गांव में स्थित है। यहां बाबा रामदेव का एक छोटा मंदिर एवं सरोवर भी है।