मास्‍टर जी

तन मन या धन – क्या अर्पण करें ?

मनुष्य जन्म में आ कर इस जन्म को सफल कैसे करना है ये सब पिछले युगों में गुरुकुल में पढ़ाया जाता था। इससे पहले जो युग हुए, द्वापरयुग, त्रेतायुग, इनमें शुरु से ही बच्चे गुरुकुल में भेजे जाते थे और उनको जीवन जीने की सिखावन दी जाती थी; सात साल की उम्र में बच्चा गुरुकुल चला जाता था और वहाँ से जब वो इक्कीस साल तक निकलता था तो उसको सब सिखावन मिल चुकी होती थी । वो सतर्क रहता था तो उसके कर्मों का इतना खाता नहीं बनता था । अब कलयुग है और किसी के पास ज़िन्दगी का ज्ञान नहीं है; हर समय माया! माया ! माया ! इसलिए मर कर सब लौटने वाले हैं । हम माया में, संसार में धन को सबसे ऊँचा रखते हैं, ब्रह्म के मार्ग पर धन को सबसे तुच्छ कहा है, सबसे नीचे है । क्यों ? अब उदाहरण के तौर पर मान लो तुमने अपनी पूरी जिन्दगी में एक करोड़ रूपया इकट्ठा किया और अचानक पता लगा कि बेटे को कैंसर हो गया है । केवल बारह साल का बेटा है; अब डॉक्टर कहता है कि इसका इलाज अमरीका जाकर कराना पड़ेगा और उसका खर्चा कम से कम एक करोड़ होगा; क्या करोगे ? बारह साल के बेटे का इलाज नहीं करवाओगे? हर माँ-बाप कहेंगे कि सब कुछ बेच दो पर बेटे को बचाओ और तुम भी सारी ज़िन्दगी की पूंजी उठाकर बेटे को बचाने के लिए खर्च कर दोगे । है ना ? तो धन बड़ा है या तन बड़ा है ? धन तन से नीचे आ गया । तन को बचाने के लिए धन को वापिस कर दिया जो जिन्दगी भर इकट्ठा किया था । अब तन और मन से आगे है, मन ! तू अपनी तन की सेवा दे सकता है, तू अपने धन की सेवा दे सकता है । पर मन ? मन यानी जो तेरे अंदर विचार चल रहे हैं ! ‘मैं-मेरा’ के विचार चल रहे हैं यानी अंहकार ! अब उसको ‘तू-तेरा’ में बदलना है कि मेरा नहीं तेरा। अपनी वाणी के माध्यम से मैं जो ज्ञान तुम्हें देता हूँ वो तुम्हारे ‘मैं-मेरा’ पर ही प्रहार कर रहा है । तन और धन की बात ही नहीं करता। मैं मन के ऊपर चोट मारता हूँ ! तो मन के अंदर ‘मैं-मेरा’ को ‘तू-तेरा’ में बदल दे, बस ! और मन,  तन और धन से ऊँचा है, इसलिए सभी ब्रह्मज्ञानियों ने कहा कि तू छोड़ तन और धन की बातें, तू मन पर वार कर ।