एआई की तस्वीर से मिट्टी की दुर्गा प्रतिमा गढ़कर दादू-पोते ने खींचा सबका ध्यान

बांकुड़ा, 18 अक्टूबर । कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तकनीक और दादू-पोते के कुशल हाथों के मेल से गढ़े दुर्गा प्रतिमाओं ने इस वर्ष शारदीय उत्सव में लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के गंगाजलघाटी के दुबेड़ांगा के बुजुर्ग मूर्तिकार चंडी सूत्रधर और उनके पोते रूपम दास की संयुक्त कला को इस वर्ष दुर्गापूजा में काफी सराहना मिल रही है। पूजा समितियों के प्रतिनिधि मोबाइल स्क्रीन पर एआई की मदद से तैयार दुर्गा प्रतिमाओं की तस्वीरें लेकर आ रहे थे। इन तस्वीरों के आधार पर दोनों कलाकारों ने मिट्टी की प्रतिमाओं को उसी स्वरूप में तैयार किया। उनकी बनाई प्रतिमाएं विभिन्न पूजा मंडपों की शोभा बढ़ा रही हैं।

इस वर्ष इस जोड़ी की बनाई एक अनोखी दुर्गा प्रतिमा मेजिया के तिवारीडांगा स्थित पूजा मंडप में पहुंची है, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस प्रतिमा में लाल साड़ी पहने नृत्य करती दस भुजाओं वाली मां दुर्गा को दर्शाया गया है। उनके पीछे नीलकंठ भगवान शिव का तांडव रूप है, जबकि नीचे गणेश और कार्तिकेय को आधुनिक स्वरूप में दिखाया गया है। इसके अलावा बांकुड़ा के बेलडांगा, जंगपुर, राधामाधवपुर, बड़ा लालपुर और नंदनपुर समेत विभिन्न क्षेत्रों के पूजा मंडपों में भी इन दोनों कलाकारों की बनाई प्रतिमाएं समय पर पहुंचा दी गई हैं।

पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ा रहे 62 वर्षीय मूर्तिकार चंडी सूत्रधर ने बताया कि वह 16-17 वर्ष की उम्र से ही प्रतिमाएं बना रहे हैं। अपने दादा और पिता के रास्ते पर चलते हुए उन्होंने इस पेशे को अपनाया। इस वर्ष उनके जिम्मे कुल 15 प्रतिमाएं बनाने की जिम्मेदारी थी। इनमें से आठ प्रतिमाएं उन्होंने अपनी कार्यशाला में बनाईं, जबकि बाकी सात प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए उन्हें बाहर जाकर काम करना पड़ा। बारिश के कारण मिट्टी मिलने में परेशानी हुई। इसके चलते उन्हें देर रात तक काम करना पड़ा।

चंडी सूत्रधर के योग्य उत्तराधिकारी रूपम दास बांकुड़ा शहर में रहते हैं। कोरोना महामारी के दौरान लंबे समय तक चले लॉकडाउन के समय से ही उन्होंने अपने दादा के पास प्रतिमा बनाने का काम सीखना शुरू किया था।

तिवारीडांगा की विशेष प्रतिमा के बारे में रूपम ने बताया कि लगभग दो महीने पहले पूजा समिति के सदस्यों ने उन्हें एआई तकनीक से तैयार लाल साड़ी पहने एक देवी की तस्वीर दिखाई थी। समिति ने उसी तस्वीर के अनुरूप प्रतिमा बनाने का आग्रह किया था। उस तस्वीर के स्वरूप को मन में उतारकर प्रतिमा तैयार करने में उन्हें 10 से 15 दिन लगे। इसके बाद लगातार पांच दिनों तक प्रतिमा पर बारीकी से रंग करने का काम चला। पूजा के दिन नजदीक आने के साथ ही तैयार प्रतिमाओं को संबंधित पूजा मंडपों तक पहुंचा दिया गया, जिससे उत्सव की रौनक और बढ़ गई।