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कोलकाता, 23 सितंबर।

अविभाजित बंगाल के समय से चली आ रही पानीतर गांव की दुर्गापूजा करीब चार शताब्दी पुरानी है। बताया जाता है कि तारिणीचरण बंद्योपाध्याय ने एकचाला घर में इस पूजा की शुरुआत की थी। समय के साथ एकचाला कच्चे घर से यह पूजा पक्के भवन और धुनि के घर तक पहुंची और आज यह पूरे गांव की पूजा बन चुकी है।

स्थानीय लोगों आनंद चक्रवर्ती, जयंता विश्वास और रशीदुल मोल्ला का कहना है कि चार दिनों तक चलने वाली यह दुर्गापूजा अब उत्सव और मिलन का केंद्र बन चुकी है। अष्टमी के दिन विभिन्न समुदायों के लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। उनके अनुसार यह पूजा आज भी सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक एकता का संदेश देती है।

इछामती नदी के किनारे स्थित इस पूजा में आज भी बांग्लादेश से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। घोजाडांगा सीमा क्षेत्र से भी कई श्रद्धालु और दर्शक पूजा में शामिल होने आते हैं। मान्यता है कि साहित्यकार विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की पहली पत्नी गौरी देवी का घर भी इसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ था। इसी इलाके में बैठकर विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने प्रसिद्ध उपन्यास ‘बकुल बासर’ की रचना की थी।

स्थानीय लोगों के अनुसार कभी यहां हैजक की रोशनी में दुर्गापूजा का भव्य उत्सव आयोजित होता था। समय के साथ उस दौर की कई यादें और परंपराएं भले ही बदल गई हों, लेकिन उस समय की भावनाएं आज भी लोगों के मन में जीवित हैं।

विसर्जन के दिन भी यहां विशेष परंपरा देखने को मिलती है। श्रद्धालु कंधे पर प्रतिमा लेकर इछामती नदी तक पहुंचते हैं और विधि-विधान से विसर्जन करते हैं। इसके बाद एक-दूसरे का आलिंगन कर मिठाई खिलाने की परंपरा के माध्यम से भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया जाता है।