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—कौशल मूंदड़ा—

उदयपुर, 5 अक्टूबर। झीलों का शहर, विख्यात है पर्यटन सिटी के रूप में, कोई ऐसा वीकेंड नहीं जाता जब यहां पर्यटकों की रेलमपेल न रहे। विदेशी से ज्यादा देशी पर्यटक ज्यादा नजर आते हैं। बड़े—बड़े अर्थशास्त्री और व्यापारिक संगठन बड़े गर्व से कहते हैं कि उदयपुर शहर की इकोनॉमी पर्यटन आधारित है, और यह बात गलत भी नहीं है।

लेकिन, इस गर्वोक्ति के बीच ​गत सप्ताह एक ऐसा दृश्य सामने आया जो हमारी इस गर्वोक्ति पर यह सवाल खड़े कर गया कि क्या इस पीढ़ी को इस गर्वोक्ति को भुनाने का अधिकार है, क्योंकि झीलों का शहर आज की पीढ़ी की देन तो है नहीं, न ही यहां का स्थापत्य ही आज की पीढ़ी का स्थापित किया हुआ है जो इस पर वह कह सके कि हमने पर्यटन शहर में यह योगदान दिया है।

हां, एक बड़ा योगदान जो आज की पीढ़ी को देने का कर्तव्य भी बनता है, वह है आने वाले पर्यटक की मेहमाननवाजी को भुनाने से पहले उसे पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराना। ज्यादा नहीं तो ट्रैफिक सिस्टम ही सही करना काफी होगा।

जी हां, हम उसी दृश्य की बात कर रहे हैं जब उदयपुर शहर के महापौर और सत्तासीन संगठन के शहर के शीर्षक पदाधिकारी खुद ट्रैफिक संभालते हुए नजर आए। इस दृश्य पर भी अधिकतर लोगों ने उनकी जागरूकता, तत्परता और कर्तव्यपरायणता को लेकर उन्हें बधाई दी और अनुकरणीय बताया। तात्कालिक परिस्थितियों में यह बधाई उचित भी नजर आती है, लेकिन गहराई में जाएंगे तो यह स्पष्ट तौर पर उदयपुर के सिस्टम का फेल्योर माना जाना चाहिए।

क्यों नहीं सिस्टम को यह समझने में समय लग रहा है कि उदयपुर में भले ही ​एलिवेटेड रोड का काम चल रहा हो, लेकिन क्या आने वाला पर्यटक इसके चलते आने से खुद को रोकेगा और यदि वह रोकने लग गया तो जिस पर्यटन आधारि अर्थव्यवस्था का हम दंभ भरते हैं, क्या वह नहीं चरमराएगी?

इस घटना के अगले दिन एक और समाचार सामने आता है कि सूरजपोल से गुलाबबाग मार्ग पर एक—दो अतिक्रमण हटाए गए, यह बात अलग है कि इस कार्रवाई के बाद जनता में कुछ अतिक्रमण छोड़ दिए जाने की भी चर्चा शुरू हो गई।

जरूरत इस बात की थी कि जिस वजह से शहर में जाम लग रहा है, आने वाले मेहमान और शहर में रहने वाले मेजबान दोनों ही फंस रहे हैं, उस वजह को ढूंढा जाए, समझा जाए और उसका स्थायी समाधान निकाला जाए।

कोई इस बात को नहीं नकार सकेगा कि जिस पीक आवर्स में ट्रैफिक सिस्टम मुस्तैद होना चाहिए, तब भी वह राजस्थान को छोड़ अन्य नंबरों वाले वाहनों पर फोकस करता हुआ नजर आता है।

सारी गलती सिस्टम की भी नहीं है, शहर का सिविक ​सेंस भी साइड ट्रैफिक को साइड नहीं देता है।

सबसे पहले टेम्पो वाले जो अचानक कहीं भी ब्रेक लगा देते हैं, लेफ्ट में लेने की जहमत भी नहीं उठाते। इसका स्पष्ट प्रमाण देखना हो तो सुबह—शाम सेवाश्रम पर खड़े हो जाइये, जब सरकारी रेड बसें महाराणा प्रताप सेतु पर चढ़ती हैं तो अचानक लेफ्ट साइड में कॉर्नर पर ही टेम्पो खड़े नजर आते हैं और बस को अचानक स्टीयरिंग राइट साइड में मोड़ना पड़ता है। ऐसा होते ही पीछे फ्लाईओवर के नीचे से जो ट्रैफिक सेतु पर चढ़ने की गति में होता है, अचानक ब्रेक लगते हैं और जाम की स्थिति शुरू हो जाती है।

लेकिन, सिविक सेंस की कमी बताकर सिस्टम को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। लम्बे समय से जो अनुभव सामने आ गए हैं ​और जिन प्वॉइंट्स पर जाम के कारण स्पष्ट नजर आ चुके हैं, उनमें सुधार के लिए क्या कदम उठाने की तैयारी की है, उस पर स्वयं सिस्टम को विचार करना होगा।

और यदि इस स्थिति को भगवान भरोसे ही मानकर हमारा ध्यान सिर्फ पर्यटन सिटी के तमगे को सीने पर लगाए गर्व महसूस करने में ही रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब या तो पर्यटक उदयपुर शहर के बजाय शहर की परिधि से दूर अपना डेरा बनाने लगे हैं ​जैसा कि धीरे—धीरे हो रहा है, भीतरी शहर में पर्यटकों के पगफेरे कम होते जाएंगे, और यह दृश्य उस वक्त तो नजर आ ही जाएगा जब एलिवेटेड रोड बनकर तैयार हो जाएगी। पर्यटक शहर की तरफ ऊपर से नीचे झांकेगा भी नहीं।

तब यह जो नाश्ता दुकान के अंदर तैयार कर सड़क पर कुर्सी—टेबल लगाकर मेहमाननवाजी का अंदाज है, वह कहीं खो न जाए, कुर्सी—टेबल तो होंगे लेकिन उन पर बैठने वाले कम हो जाएंगे।

चिंता कीजिये अपने शहर की, अपने शहर की रीढ़ पर्यटन की जो हमारे पुरखों की देन है (हम तो सही ट्रैफिक सिस्टम भी नहीं दे पा रहे जनाब)।

चिंता कीजिये अपने मेहमाननवाजी की, मेहमान यहां से जाने के बाद यहां के ट्रैफिक सिस्टम को कोसता हुआ ही जाता है (इसमें पार्किंग भी शामिल समझें)।

चिंता कीजिये भीतरी शहर में मेहमनों के पगफेरों की, मेहमानों ने अपने डेरे उदयपुर की बलीचा—प्रतापनगर—सुखेर रिंग रोड से बाहर बसाने शुरू कर दिए हैं (कहीं यह रिंग रोड काया वाले बायपास तक न पहुंच जाए)।

चिंता कीजिये अपने बच्चों के भविष्य की, क्या वे रेंग—रेंग कर सरकते ट्रैफिक में रहने को मजबूर होंगे (वैसे भी भीतरी शहर से कई पुश्तैनी परिवार बाहरी शहर में जाकर बस चुके हैं)।

बस इतनी सी चिंता आज की पीढ़ी और आज का सिस्टम कर ले तो हम लोग जिन्होंने भले ही उदयपुर के तमगों में कोई नया चांद नहीं जोड़ा है, लेकिन चांद की चमक को तो बरकरार रखने पर गर्व कर सकेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)