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राणा हम्मीर के पराक्रम से पुनर्जीवित हुई थी सनातन संस्कृति और स्वायत्त हिंदू रियासतें — प्रो. बी.पी. शर्मा

चित्तौड़ विजय के 700 स्वर्णिम वर्ष पर मेदपाट विचार मंच की ओर से प्रताप गौरव केंद्र पर विशेष परिचर्चा

उदयपुर, 31 अक्टूबर (कौशल मूंदड़ा)। आज से ठीक सात सदी पूर्व सन् 1326 में महापराक्रमी राणा हम्मीर सिंह द्वारा चित्तौड़गढ़ को विदेशी आक्रांताओं के चंगुल से मुक्त कराना केवल एक किले की विजय नहीं थी, बल्कि यह आक्रांताओं की गुलामी के अंधकार को चीरकर स्वायत्त हिंदू साम्राज्यों के पुनरुत्थान का ऐतिहासिक सूर्योदय था।

यह बात शनिवार को उदयपुर के प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ में ‘मेदपाट विचार मंच’ की ओर से ‘राणा हम्मीर की चित्तौड़ विजय के 700 वर्ष’ विषय पर आयोजित संवाद एवं परिचर्चा में वक्ताओं ने कही।

मेवाड़ की पावन धरा पर शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम के इस गौरवशाली अध्याय के 700 वर्ष पूरे होने पर कार्यक्रम के मुख्य वक्ता मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान के केन्द्रीय अध्यक्ष अशोक सिंह मेतवाला ने विस्तार से विषय रखते हुए कहा कि यदि राणा हम्मीर वह अदम्य साहस न दिखाते और मेड़पाड़ पुनः एकलिंगनाथ के चरणों में समर्पित न होता, तो आज भारतवर्ष का इतिहास कुछ और ही होता। राणा हम्मीर के इस ऐतिहासिक विजय अभियान से पूरे देश में राष्ट्रव्यापी पुनरुत्थान हुआ। उनके ही प्रेरणा और प्रभाव से दक्षिण में विजयनगर जैसे विशाल साम्राज्य की नींव पड़ी। मेतवाला ने कहा कि मेवाड़ के इन महान योद्धाओं ने संपूर्ण देश में छाई निराशा और अंधकार के बीच एक नई मशाल जलाई थी, जिसके प्रताप से आगे चलकर महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जैसे महान राष्ट्रनायक पैदा हुए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष प्रो. भगवती प्रकाश शर्मा ने अपने उद्बोधन में इतिहास के अनछुए और गौरवशाली पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सन् 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण और भीषण जौहर व साके के बाद मेवाड़ का संघर्ष थम नहीं था। सिसौदा गांव में जन्मे राणा हम्मीर ने किशोरावस्था से ही मेवाड़ को स्वतंत्र कराने का बीड़ा उठाया। मात्र 18 वर्ष की आयु में उन्होंने मेवाड़ के बड़े भू-भाग पर नियंत्रण कर लिया और 1326 में चित्तौड़ को मुक्त करा लिया।

मेवाड़ की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने 1336 में मेवाड़ पर आक्रमण किया, लेकिन ‘सिंगोली के युद्ध’ में राणा हम्मीर ने सल्तनत की विशाल सेना को धूल चटाते हुए सुल्तान तुगलक को युद्ध में पराजित कर बंदी बना लिया। वह सुल्तान चित्तौड़ में छह माह तक कैदी रहा। उसे मुक्त करने के एवज में दिल्ली सल्तनत को अजमेर, रणथम्भौर, नागौर और सोपोर के क्षेत्र मेवाड़ को सौंपने पड़े तथा 50 लाख रुपए, 100 हाथी और अपार सोना-चांदी दंड के रूप में देने पड़े।

‘मेदपाट विचार मंच’ का हुआ शुभारंभ, नई पीढ़ी के प्रबोधन पर जोर

कार्यक्रम के दौरान ‘मेदपाट विचार मंच’ की रूपरेखा रखते हुए निदेशक अनुराग सक्सेना ने कहा कि आज की वैश्विक और वैचारिक परिस्थतियों में नई पीढ़ी को सही इतिहास से अवगत कराना और उनमें वैचारिक स्पष्टता लाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि यह मंच किसी प्रकार का औपचारिक संगठन मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत वैचारिक प्लेटफार्म है, जहां प्रबुद्धजन मिलकर समसामयिक और ऐतिहासिक विषयों पर मंथन करेंगे और समाज का सही मार्गदर्शन करेंगे।

कई ने रखे विचार

कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर मीरा कन्या महाविद्यालय की इतिहास विषय की आचार्य प्रो. शिल्पा मेहता, अधिवक्ता रमन सूद, एमपीयूएटी के पूर्व कुलपति प्रो. उमाशंकर शर्मा, सुविवि की पूर्व अधिष्ठाता प्रो. सीमा मल्लिक, प्रताप गौरव शोध केन्द्र के अधीक्षक डॉ. विवेक भटनागर, डॉ. कपिल देव आमेटा, सुविवि इतिहास विभाग के सह आचार्य डॉ. मनीष श्रीमाली, नशा मुक्त संस्थान के निर्भय सिंह राणावत सहित इतिहास प्रेमियों, बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध नागरिकों ने राणा हम्मीर के जीवन प्रसंगों व उनके सामरिक, भू-राजनीतिक महत्व पर अपने विचार साझा किए। रमन सूद आदि ने विचार रखे। कार्यक्रम संयोजक डॉ. सुभाष भार्गव ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।