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पश्चिमी सिंहभूम, 20 दिसंबर ।पश्चिमी सिंहभूम जिले में एंबुलेंस न मिलने के कारण एक पिता को अपने बच्चे का शव थैले में रखकर गांव ले जाने की हृदयविदारक घटना पर सियासी हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक ने इस घटना को स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता और सरकारी तंत्र की विफलता करार दिया है।

पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने इस घटना को “इंसानियत को शर्मसार करने वाला” बताते हुए कहा कि सदर अस्पताल चाईबासा में जो हुआ, वह किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है। उन्होंने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है कि एक आदिवासी पिता को अपने बच्चे का शव थैले में रखकर जंगल-पहाड़ी रास्तों से गांव ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह घटना सरकार और स्वास्थ्य विभाग के बड़े-बड़े दावों की पोल खोलती है।

गीता कोड़ा ने कहा कि आदिवासी और सुदूर ग्रामीण इलाकों में आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है। खनिज संपदा से समृद्ध इस जिले से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व मिलता है, लेकिन यहां के लोगों को न समय पर इलाज मिल पा रहा है और न ही आपात स्थिति में एंबुलेंस जैसी मूलभूत सुविधा। उन्होंने आरोप लगाया कि जिले में एक लाख से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और ऐसे हालात में संवेदनशील प्रशासन और विकास के दावे खोखले साबित होते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि इससे पहले भी स्वास्थ्य विभाग की गंभीर लापरवाहियां सामने आ चुकी हैं, लेकिन न तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई हुई और न ही व्यवस्था में ठोस सुधार। गीता कोड़ा ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई तथा सुदूर गांवों में एंबुलेंस सेवा, डॉक्टरों की तैनाती और आवश्यक स्वास्थ्य संसाधनों की तत्काल व्यवस्था की मांग की।

घटना की जानकारी मिलने पर गीता कोड़ा शनिवार को नोवामुंडी प्रखंड के सुदूर जंगल क्षेत्र स्थित बालजोड़ी गांव पहुंचीं और शोकाकुल परिवार से मुलाकात कर उन्हें ढाढ़स बंधाया।

वहीं, इस मामले पर झारखंड के पूर्व मंत्री और भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बड़कुंवर गागराई ने भी राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने इसे स्वास्थ्य तंत्र की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता का प्रतीक बताते हुए कहा कि सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और आदिवासी वर्ग को उठाना पड़ रहा है।

बड़कुंवर गागराई ने कहा कि अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है—चाहे एंबुलेंस हो, ब्लड बैंक हों या मरीजों के लिए बेड। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की हेमंत सोरेन सरकार और स्वास्थ्य मंत्री केवल बयानबाजी तक सीमित हैं, जबकि जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक है। उन्होंने इस घटना को अमानवीय बताते हुए स्वास्थ्य मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की मांग भी की।

स्थानीय लोगों में भी इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि यह मामला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी सिंहभूम जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली को उजागर करता है। लोग एंबुलेंस व्यवस्था को सुदृढ़ करने, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या झारखंड के सुदूर और आदिवासी इलाकों में गरीबों को आज भी सम्मानजनक इलाज और अंतिम यात्रा का अधिकार मिल पाएगा, या ऐसी घटनाएं यूं ही व्यवस्था की संवेदनहीनता की कहानी बनती रहेंगी।