रांची, 03 जून । रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान की अधिग्रहीत भूमि से जुड़े बहुचर्चित फर्जीवाड़ा मामले में गिरफ्तार दो आरोपितों राजकिशोर बड़ाईक और कार्तिक बड़ाईक की जमानत याचिका पर बुधवार को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की विशेष अदालत में सुनवाई पूरी हो गई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामले में अब 6 जून को अदालत अपना आदेश सुनाएगी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने अदालत से दोनों आरोपितों को जमानत देने की मांग की। उनका तर्क था कि मामले की जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है और आरोपित जांच एजेंसी के समक्ष सहयोग कर रहे हैं। वहीं, एसीबी की ओर से अदालत में जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि मामला सरकारी भूमि से जुड़े बड़े फर्जीवाड़े का है और इसकी जांच अभी जारी है। एजेंसी ने अदालत को बताया कि आरोपितों की भूमिका गंभीर प्रकृति की है तथा मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों की जांच अभी शेष है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष अदालत ने तत्काल कोई निर्णय नहीं दिया और मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों, जांच की प्रगति और प्रस्तुत तर्कों का परीक्षण करने के बाद 6 जून को आदेश सुनाया जाएगा।
एसीबी ने गत 7 अप्रैल को इस मामले में चार आरोपितों राजकिशोर बड़ाईक, कार्तिक बड़ाईक, राजेश झा और चेतन कुमार को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि सभी ने आपसी मिलीभगत से रिम्स की अधिग्रहीत सरकारी भूमि को निजी संपत्ति के रूप में प्रदर्शित करने के लिए फर्जी वंशावली और अन्य दस्तावेज तैयार किए थे। इन दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन पर निजी स्वामित्व का दावा करने का प्रयास किया गया।
यह मामला झारखंड उच्च न्यायालय के संज्ञान में आने के बाद चर्चा में आया था। उच्च न्यायालय के निर्देश पर एसीबी ने 5 जनवरी को प्राथमिकी दर्ज कर विस्तृत जांच शुरू की थी। जांच के दौरान राजस्व अभिलेखों, भूमि दस्तावेजों और अन्य संबंधित रिकॉर्ड की पड़ताल की गई, जिसमें कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। इन्हीं तथ्यों के आधार पर आरोपितों की संलिप्तता उजागर होने के बाद उनकी गिरफ्तारी की गई।
दरअसल, यह पूरा मामला वर्ष 1964-65 में रिम्स के लिए अधिग्रहीत की गई लगभग 9.65 एकड़ सरकारी जमीन से जुड़ा है। आरोप है कि इस भूमि के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जा कर लिया गया और उसे निजी जमीन के रूप में प्रस्तुत किया गया। बाद में वहां अपार्टमेंट, दुकानें और आवासीय भवनों सहित कई स्थायी निर्माण भी कर लिए गए।
मामला न्यायालय पहुंचने पर भूमि अभिलेखों और सरकारी दस्तावेजों की जांच की गई। सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने संबंधित भूमि को रिम्स की अधिग्रहीत संपत्ति माना। इसके बाद न्यायालय के निर्देश पर प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माणों को ध्वस्त कराया था। इस कार्रवाई के बाद पूरे प्रकरण की जांच तेज हुई और कथित फर्जी दस्तावेजों तथा वंशावली तैयार कर सरकारी जमीन पर दावा करने के आरोपों की जांच एसीबी को सौंपी गई।
फिलहाल मामले में गिरफ्तार आरोपित न्यायिक हिरासत में हैं और अब सभी की नजरें 6 जून को आने वाले अदालत के आदेश पर टिकी हैं। अदालत का निर्णय इस बहुचर्चित भूमि फर्जीवाड़ा मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
