-जनवरी से अब तक 113 नक्सली गिरफ्तार, 50 ने किया आत्मसमर्पण
-22 नक्सलियों की मुठभेड़ में मौत, 111 हथियार और 9,904 कारतूस बरामद
-संगठित अपराध के खिलाफ 193 गिरफ्तारियां, संदिग्धों की प्रोफाइल तैयार
रांची, 10 सितंबर । कभी झारखंड की पहचान जंगलों में गूंजती गोलियों, बारूदी सुरंगों और नक्सली दस्तों की मौजूदगी से होती थी। शाम ढलते ही सुदूर ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा बलों की चौकसी बढ़ जाती थी। सड़क पर चलना हो या किसी विकास परियोजना को आगे बढ़ाना, हर कदम के साथ नक्सली हिंसा का जोखिम था। लेवी वसूली ने कई इलाकों में समानांतर आर्थिक व्यवस्था खड़ी कर दी थी और भय उसका सबसे बड़ा हथियार था।
वर्षों की लड़ाई के बाद अब वह तस्वीर बदल चुकी है। जंगलों में नक्सली गतिविधियां सिमटी हैं, कई बड़े कमांडर मारे गए या गिरफ्तार हुए और बड़ी संख्या में नक्सली आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे। सुरक्षा बलों की रणनीति, खुफिया तंत्र और लगातार चलाए गए अभियानों ने नक्सली संगठनों की ताकत को काफी कमजोर किया है। लेकिन झारखंड में अपराध की कहानी खत्म नहीं हुई। उसका भूगोल बदला है, तरीका बदला है और चेहरे भी बदले हैं।
जहां कभी जंगलों में नक्सली लेवी की वसूली करते थे, वहीं अब शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में संगठित आपराधिक गिरोह रंगदारी, जमीन, कोयला-बालू, कंस्ट्रक्शन और ठेकेदारी के कारोबार में अपना प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पुलिस के सामने इसलिए अब दोहरी चुनौती है, बची हुई नक्सली गतिविधियों को पूरी तरह खत्म करना और संगठित अपराध के आर्थिक एवं आपराधिक नेटवर्क को ध्वस्त करना।
नक्सलवाद पर निर्णायक बढ़त
झारखंड पुलिस मुख्यालय के जनवरी से अबतक के आंकड़े नक्सल विरोधी अभियान की तस्वीर साफ करते हैं। इस अवधि में राज्य में 113 नक्सली गिरफ्तार किए गए। इनमें 49 माओवादी, 30 पीएलएफआई, 23 टीएसपीसी, 10 जेजेएमपी और एक एसजेएमएम का सदस्य शामिल हैं। इसी अवधि में 50 नक्सलियों ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया, जबकि मुठभेड़ों में 22 माओवादी मारे गए। अभियानों के दौरान 111 हथियार और 9,904 कारतूस बरामद किए गए।
इन आंकड़ों का महत्व इसलिए भी है कि नक्सल विरोधी कार्रवाई अब केवल जंगलों में मुठभेड़ तक सीमित नहीं रही। पुलिस ने संगठन के कैडर, हथियार और गतिविधियों के नेटवर्क पर लगातार दबाव बनाया है। आईजी अभियान सह पुलिस प्रवक्ता नरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार झारखंड में नक्सलवाद लगभग समाप्त हो चुका है। जहां भी नक्सलियों की गतिविधि या मूवमेंट की सूचना मिलती है, वहां अभियान चलाया जा रहा है।
जंगल से शहर तक पहुंची अपराध की चुनौती
नक्सलवाद कमजोर पड़ा तो अपराध की चुनौती का स्वरूप भी बदलने लगा। शहरों में संगठित आपराधिक गिरोहों की सक्रियता पुलिस के लिए नई चिंता बन गई। रंगदारी के लिए धमकी और फायरिंग, जमीन पर कब्जे का दबाव, कोयला और बालू के कारोबार में वर्चस्व, निर्माण परियोजनाओं तथा ठेकेदारी में हस्तक्षेप- इन गतिविधियों में अलग-अलग गिरोहों के नाम सामने आते रहे हैं। प्रिंस खान, राहुल दुबे, राहुल सिंह, अखिलेश सिंह, अमन साव, सुजीत सिन्हा, डब्लू सिंह और पांडेय गिरोह समेत कई आपराधिक नेटवर्क पुलिस की निगरानी में हैं।
बड़े अपराधियों पर कार्रवाई के बावजूद चुनौती इसलिए बनी हुई है क्योंकि संगठित अपराध किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि कई स्तरों पर फैला नेटवर्क होता है। सरगना जेल में हो सकता है लेकिन बाहर उसके गुर्गे, आर्थिक मददगार और संपर्क तंत्र सक्रिय रह सकते हैं। यही कारण है कि पुलिस अब केवल गिरफ्तारी के आंकड़ों से आगे बढ़कर नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है।
193 गिरफ्तारियां, 63 हथियार बरामद
पुलिस मुख्यालय के अनुसार, जनवरी से अबतक संगठित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान में 193 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया है। इनके पास से 63 हथियार और 274 गोलियां बरामद हुईं। 47 अपराधियों को जिला बदर किया गया, जबकि नौ के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया। कार्रवाई के बावजूद रंगदारी और फायरिंग जैसी घटनाएं बताती हैं कि चुनौती अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई तभी स्थायी परिणाम दे सकती है जब उनके आर्थिक और संगठनात्मक आधार को भी कमजोर किया जाए।
अब निशाने पर अपराध की आर्थिक रीढ़
यही वजह है कि पुलिस की रणनीति में आर्थिक नेटवर्क को प्रमुख स्थान दिया गया है। कुख्यात अपराधियों की चल-अचल संपत्ति, बैंक खातों, आर्थिक लेन-देन और वित्तीय गतिविधियों की जानकारी जुटाई जा रही है। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि अपराध से अर्जित धन कहां जाता है, किन कारोबारों में लगाया जाता है और कौन लोग उसे संचालित या उपलब्ध कराते हैं। अपराध की दुनिया में पैसा केवल कमाई नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क को चलाने का ईंधन है। हथियार खरीदने से लेकर गुर्गों को भुगतान, ठिकाने की व्यवस्था और प्रभाव कायम रखने तक आर्थिक संसाधनों की भूमिका रहती है। इसलिए आर्थिक स्रोतों पर चोट को पुलिस संगठित अपराध की कमर तोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम मान रही है।
150 से अधिक लोगों की प्रोफाइल तैयार
पुलिस के अनुसार, कुख्यात आपराधिक गिरोहों से जुड़े 150 से अधिक लोगों की विस्तृत प्रोफाइल तैयार की जा चुकी है। इसमें प्रमुख गिरोहों से जुड़े वर्तमान और पूर्व अपराधियों के साथ उनके संपर्कों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। जांच का दायरा अब अपराधी तक सीमित नहीं है। आर्थिक मददगार, संरक्षण देने वाले, लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने वाले और अपराधियों को ठिकाना देने वालों की भूमिका भी जांची जा रही है। एटीएस की टीमें वर्तमान और पूर्व अपराधियों के घरों तक पहुंचकर भौतिक सत्यापन कर रही हैं। इससे पुलिस को संपत्ति, रहन-सहन, संपर्क और आर्थिक गतिविधियों के बारे में वास्तविक जानकारी जुटाने में मदद मिल रही है। पुलिस की कोशिश अब इस पूरी कड़ी को एक साथ जोड़कर देखने की है।
डिजिटल डेटाबेस से जुड़ेगा पूरा नेटवर्क
संगठित अपराध से निपटने के लिए पुलिस ऑनलाइन डिजिटल डेटाबेस तैयार कर रही है। इसमें अपराधियों के आपराधिक रिकॉर्ड के साथ उनके सहयोगियों, संपत्ति, बैंक खातों और नेटवर्क से जुड़ी जानकारी दर्ज होगी। आईजी (अभियान) नरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार पुलिस का लक्ष्य केवल एक अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं है। उसके पीछे मौजूद लोगों, आर्थिक मददगारों और हथियार से लेकर ठिकाने तक की व्यवस्था करने वालों की पहचान भी की जा रही है। इसका मतलब साफ है कि पुलिस की जांच अब अपराधी से नेटवर्क और नेटवर्क से आर्थिक स्रोत तक पहुंच रही है।
आधुनिकीकरण से बढ़ेगी कार्रवाई की क्षमता
बदलती चुनौती के बीच पुलिस आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है। वर्ष 2025-26 में राज्य के 12 जिलों में ज्वाइंट पुलिस स्टेशन का निर्माण कराया जा रहा है। पांच जिलों में सीआई और एसडीपीओ कार्यालय सह आवास का निर्माण जारी है। पुलिस मुख्यालय के अनुसार, वर्ष 2026 में झारखंड पुलिस को 636 चारपहिया और 849 दोपहिया वाहन उपलब्ध कराए गए हैं। इसके अलावा 627 चारपहिया और 848 दोपहिया वाहनों की खरीद के आदेश जारी किए गए हैं। बेहतर वाहन, तकनीकी निगरानी और डिजिटल रिकॉर्ड पुलिस की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसके तहत अपराध के खिलाफ कार्रवाई को अधिक तेज, लक्षित और समन्वित बनाने की कोशिश की जा रही है।
अब लड़ाई बंदूक से ज्यादा नेटवर्क की
झारखंड ने नक्सलवाद के खिलाफ लंबी और कठिन लड़ाई में बड़ी बढ़त हासिल की है। जंगलों में सक्रिय सशस्त्र संगठनों की ताकत कमजोर हुई है। बड़ी संख्या में नक्सली गिरफ्तार हुए, मुठभेड़ों में मारे गए या आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे। लेकिन इसी के साथ अपराध का नया स्वरूप सामने आया है। अब चुनौती जंगल में छिपे दस्ते की नहीं बल्कि शहर और कारोबार में फैले नेटवर्क की है। इसलिए पुलिस की अगली लड़ाई सिर्फ बंदूक के खिलाफ नहीं होगी। यह पैसा, संपत्ति, हथियार, सहयोगी, संरक्षण और अपराध से अर्जित आर्थिक साम्राज्य के खिलाफ होगी।
नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में पुलिस को जंगलों में मौजूद सशस्त्र नेटवर्क को कमजोर करना था। संगठित अपराध के खिलाफ लड़ाई में उसे पूरे तंत्र को देखना होगा, सरगना से गुर्गे तक, हथियार से आर्थिक स्रोत तक और अपराधी से उसके संरक्षण तंत्र तक। यही इस लड़ाई की असली कसौटी होगी। किसी अपराधी को गिरफ्तार करना कार्रवाई है, लेकिन उसके नेटवर्क को दोबारा खड़ा होने की ताकत से वंचित करना निर्णायक सफलता होगी।
