रांची, 20 जुलाई । झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की समयपूर्व रिहाई से संबंधित स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से सजा पुनरीक्षण बोर्ड (स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड) की बैठक समय पर नहीं होने पर जवाब तलब किया है। अदालत ने पूछा कि जब उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार बोर्ड की बैठक प्रत्येक तीन माह में आयोजित की जानी है, तो निर्धारित अवधि में बैठक क्यों नहीं हुई।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सजा पुनरीक्षण बोर्ड की पिछली बैठक मार्च 2026 में आयोजित की गई थी। हालांकि, कुछ कारणों से जून माह में होने वाली अगली बैठक नहीं हो सकी। सरकार ने यह भी जानकारी दी कि बोर्ड की अगली बैठक 30 जुलाई को निर्धारित की गई है।
इस पर उच्च न्यायालय ने बैठक में हुई देरी का कारण स्पष्ट करने का निर्देश देते हुए राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। साथ ही अदालत ने 30 जुलाई को प्रस्तावित सजा पुनरीक्षण बोर्ड की बैठक में लिए गए निर्णयों की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट भी अगली सुनवाई में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने पक्ष रखा, जबकि न्यायालय की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) वरीय अधिवक्ता अमित कुमार दास ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत किया।
इससे पहले मार्च 2026 में हुई हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया था कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड) की बैठक निर्धारित समय पर आयोजित की गई थी। उस बैठक में 86 आजीवन कारावास प्राप्त दोषियों के मामलों पर विचार किया गया था। इनमें से 44 दोषियों की समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जबकि 42 मामलों को अस्वीकार कर दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि आजीवन कारावास भुगत रहे कैदियों की समयपूर्व रिहाई से संबंधित मामलों की समीक्षा के लिए राज्य सजा समीक्षा बोर्ड की बैठक प्रत्येक तीन माह में नियमित रूप से आयोजित की जाए। इन्हीं निर्देशों के अनुपालन की निगरानी झारखंड उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान जनहित याचिका के माध्यम से कर रहा है।
