ओंकार

पश्चिमी सिंहभूम, 29 जुलाई । आदिवासी हो समाज युवा महासभा, पश्चिमी सिंहभूम जिला समिति ने टाटा बाईपास चौक पर पद्मश्री शिबू सोरेन की प्रतिमा स्थापित किए जाने के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। संगठन ने मांग की है कि इस स्थान पर कोल्हान के किसी वीर अमर शहीद, भूमि पुत्र अथवा स्थानीय ऐतिहासिक महान विभूति की प्रतिमा स्थापित की जाए। महासभा का कहना है कि उसका विरोध किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान के विरुद्ध नहीं, बल्कि कोल्हान के इतिहास, विरासत और स्थानीय वीर शहीदों को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के उद्देश्य से है।

बुधवार को जारी बयान में महासभा के जिला अध्यक्ष शेरसिंह बिरुवा ने कहा कि कोल्हान की धरती वीर योद्धाओं, बलिदानियों और समाजसेवियों की भूमि रही है। हो विद्रोह, कोल विद्रोह, सेरेंगसिया घाटी का युद्ध, खरसावां गोलीकांड और गुवा गोलीकांड जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों और संघर्षों में यहां के अनेक वीर सपूतों ने अपने प्राणों की आहुति देकर क्षेत्र की अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा की है।

उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा, पोटो हो, नारा हो, बोड़ो हो, बड़ई हो, बूगनी हो, पांडुवा हो, देवी हो, केरसे मुंडा तथा ईचा-खरकई परियोजना विरोध आंदोलन के वीर शहीद गंगाराम कालुंडिया सहित अनेक महान विभूतियों का योगदान कोल्हान के इतिहास और पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शेरसिंह बिरुवा ने कहा कि हो भाषा, लिपि और साहित्य के विकास में ओत गुरु कोल लाको बोदरा का योगदान अविस्मरणीय है। वहीं कोल्हान के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले पूर्व सांसद बागुन संब्रुई, केसी हेंब्रोम, संविधान सभा सदस्य एवं पूर्व मंत्री पूर्ण चंद्र बिरुवा, सागू समाड तथा दलपत देवगम मानकी जैसी विभूतियों की सेवाएं भी सदैव स्मरणीय रहेंगी।

उन्होंने कहा कि पद्मश्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और आदिवासी समाज उनके योगदान का सम्मान करता है। हालांकि, उनका मानना है कि टाटा बाईपास जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल पर कोल्हान के किसी स्थानीय वीर शहीद या ऐतिहासिक महान विभूति की प्रतिमा स्थापित करना क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय अस्मिता के अधिक अनुरूप होगा।

महासभा ने झामुमो जिला समिति के प्रतिमा स्थापना संबंधी प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि कोल्हान के वीर शहीदों, समाज सुधारकों और ऐतिहासिक विभूतियों के सम्मान में प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर उनकी प्रतिमाएं एवं स्मारक स्थापित किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और पूर्वजों के संघर्ष से प्रेरणा प्राप्त कर सकें।