कोलकाता, 24 सितंबर । कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आगामी विधानसभा उपचुनावों से ठीक पहले ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट (एआईएसएफ) से उसका जाना-पहचाना ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न छीनने के फैसले पर चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई है। आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए अदालत ने सख्त लहजे में पूछा कि आयोग हमेशा ऐसे फैसले क्यों लेता है, जिससे अनावश्यक विवाद पैदा हो और राजनीतिक दलों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े।
न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ नौशाद सिद्दीकी की पार्टी आईएसएफ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। राज्य की दो विधानसभा सीट रेजीनगर और नंदीग्राम में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए चुनाव आयोग ने आईएसएफ को ‘अलमारी’ चुनाव चिह्न आवंटित किया है, जबकि लंबे समय से उसके पास रहे ‘लिफाफा’ चिह्न को ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस को दे दिया गया। आयोग के इस कदम के खिलाफ आईएसएफ ने उच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग की भूमिका पर गहरी नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति ने सवाल किया कि महज चार महीने पहले मुख्य चुनाव में जिस पार्टी को यह प्रतीक दिया गया था, उपचुनाव में उसे अचानक क्यों छीन लिया गया और विवाद से बचने के लिए उस चिह्न को ‘फ्रीज’ क्यों नहीं किया गया।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि चुनाव शुरू होते ही खेल शुरू हो जाता है। अदालत ने कहा कि 183 चुनाव चिह्न उपलब्ध होने के बावजूद आयोग ऐसे फैसले लेता है कि सभी पक्षों को अदालत आना पड़ता है।
अदालत में आईएसएफ के वकील विकाश रंजन भट्टाचार्य ने दलील दी कि आम मतदाताओं के बीच किसी भी तरह के भ्रम से बचने के लिए आयोग को लिफाफा चुनाव चिह्न फ्रीज कर देना चाहिए था। इसके जवाब में चुनाव आयोग के वकील ने तर्क दिया कि कागजों में आईएसएफ अभी तक कोई मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी नहीं है, इसलिए उसके पास कोई आरक्षित प्रतीक नहीं हो सकता। आयोग ने बताया कि 2021 और 2024 के चुनावों में उसे यह चिह्न एक ‘मुक्त प्रतीक’ के तौर पर मिला था।
अदालत आयोग के इस कानूनी तर्क से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हुई। न्यायमूर्ति ने कहा कि आयोग के अपने नियम हो सकते हैं, लेकिन मुख्य चुनाव में प्रतीक देने के बाद उपचुनाव में उसे छीना नहीं जा सकता और चुनाव आयोग को पूरी तरह निष्पक्ष होकर काम करना चाहिए।
अदालत ने लोकतांत्रिक तृणमूल कांग्रेस के रुख पर भी सवाल उठाए कि किसी अन्य पार्टी द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे प्रतीक की मांग उन्होंने क्यों की, जिस पर उनके वकील विश्वरूप भट्टाचार्य ने सफाई दी कि उन्होंने तीन प्राथमिकताओं की सूची दी थी, जिसमें से आयोग ने यह फैसला लिया। अंततः उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि आईएसएफ का चुनाव चिह्न बदलने के संबंध में कोई औपचारिक अधिसूचना जारी क्यों नहीं की गई, इस पर शुक्रवार तक अदालत में विस्तृत जानकारी पेश की जाए।
