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भोपाल, 26 दिसंबर। मध्य प्रदेश वर्ष 2025 में हर स्‍तर से विकास की नई इबारत नहीं लिख रहा है। वह अपनी उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को भी और सुदृढ़ करता दिखता है जिसे सदियों से उसकी अभिन्‍न चेतना माना जाता है। इस साल देखने में आया कि राज्य सरकार की नीतियाँ और बजटीय प्राथमिकताएँ यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि राज्‍य अब भक्ति और संस्कृति को भी विकास का मजबूत आधार बना रहा है।

दरअसल, यह पहली बार मध्‍य प्रदेश में देखने को मिला कि वार्ष‍िक बजट में इसके लिए 1,610 करोड़ रुपये का प्रावधान किया हुआ दिखा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 133 करोड़ रुपये अधिक है। यह वृद्धि दर्शाती है कि प्रदेश की वर्तमान मोहन सरकार वास्‍तव में आस्था को प्रदेश की प्रगति से जोड़कर देखते हैं।

इस संबंध में उपमुख्‍यमंत्री जगदीश देवड़ा का कहना है कि सरकार धार्मिक और सांस्कृतिक योजनाओं को सिर्फ प्रतीक तक सीमित रखने में विश्‍वास नहीं करती है, उसके लिए प्रदेश की सांस्‍कृतिक विरासत दीर्घकालीन सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विशेष महत्‍व रखती है। यही कारण है जो इस बार प्रदेश में श्रीकृष्ण पाथेय योजना के लिए 10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया । इस योजना का उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों, कथाओं और सांस्कृतिक विरासत को एक सुव्यवस्थित पर्यटन एवं सांस्कृतिक पथ के रूप में विकसित करना है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कई अवसरों पर यह कह चुके हैं कि श्रीकृष्ण केवल इतिहास पुरुष भर नहीं है, वे भारतीय जीवन दर्शन के केंद्र हैं। श्रीकृष्ण पाथेय योजना उसी दर्शन को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास है। अब इस पर काम भी शुरू हो गया है। इसी क्रम में राम पथ गगन योजना के लिए 30 करोड़ रुपये का प्रावधान इस साल किया गया। यह योजना भगवान श्रीराम से जुड़े पवित्र स्थलों को एक धार्मिक सर्किट के रूप में विकसित करने की दिशा में अहम मानी जा रही है। सरकार का मानना है कि रामायण से जुड़े स्थलों का संरक्षण और विकास श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक होने के साथ सांस्कृतिक पर्यटन को भी नई ऊँचाई दे रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने एक अवसर पर कहा था कि राम भारतीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक आदर्श हैं और उनसे जुड़ी विरासत का संरक्षण राज्य का कर्तव्य है। आध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन को संस्थागत स्वरूप देने के लिए गीता भवनों की स्थापना भी इस बार प्रदेश भर में प्रमुखता के साथ की जा रही है। इसके लिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इन गीता भवनों में पुस्तकालय, सभागार और साहित्य सामग्री के विक्रय केंद्र बनाए जा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य इन केंद्रों को ज्ञान, संवाद और शोध के केंद्र के रूप में विकसित करना है, जहाँ भारतीय दर्शन, गीता और संस्कृति पर गंभीर विमर्श हो सके।

श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तीर्थ दर्शन योजना के लिए 50 करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि दी गई। प्रदेश में लगातार एक साल से इस योजना के तहत वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को तीर्थ यात्रा की सुविधा दी जा रही है। मुख्यमंत्री ने इसे सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ी योजना बताते हुए कहा है कि आस्था तक पहुँच हर नागरिक का अधिकार है और सरकार इसमें सेतु का काम कर रही है। धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में उज्जैन का महाकाल लोक पहले ही मध्य प्रदेश की पहचान बन चुका है। अब सरकार इसी मॉडल पर ओंकारेश्वर और अन्य प्रमुख तीर्थ स्थलों को विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।