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कोलकाता, 01 नवंबर । कार्तिक का महीना आते ही मन में एक अजीब-सी उदासी उतरने लगती है। इसके पीछे कोई खास वजह नहीं होती, फिर भी वातावरण में एक अनजानी खामोशी और बीते दिनों की यादें घुलने लगती हैं। दुर्गापूजा के उत्सव की रौनक धीरे-धीरे विदा हो चुकी होती है। टूटे पंडालों के बीच कहीं-कहीं अकेला टिमटिमाता दीपक उस उल्लास की अंतिम निशानी बनकर रह जाता है।

धुंधली सुबह में घास की पत्तियों पर ठहरी ओस की बूंदें, उत्तर की ओर से आती सर्द हवाएं, हल्की ठंड का एहसास, समय से पहले ढलता सूरज और देखते ही देखते शाम का गहराता अंधेरा… हेमंत ऋतु की इन अनुभूतियों के साथ जुड़ी हैं हमारी अनेक पुरानी स्मृतियां। इन्हीं स्मृतियों में एक है घर की छत, चबूतरे या आंगन के किसी ऊंचे स्थान पर जलाया जाने वाला आकाशदीप, जिसे कहीं-कहीं ‘स्वर्गबाती’ भी कहा जाता है।

एक समय था, जब कार्तिक का महीना शुरू होते ही गांवों और कस्बों के घरों की छतों पर बांस के लंबे डंडे के सहारे आकाशदीप जलते दिखाई देते थे। कहीं रंगीन चीनी झालर या एलईडी बल्ब लगाए जाते थे, तो कहीं बांस के सिरे पर सरसों, तिल अथवा अरंडी के तेल से भरा दीपक टांग दिया जाता था। कई घरों में इसके लिए विशेष रूप से मिट्टी का घड़ा बनवाया जाता था। घड़े के ऊपरी हिस्से में हवा के आवागमन के लिए छोटे-छोटे छेद होते थे और उसके मुंह पर मिट्टी का एक सकोरा रख दिया जाता था। इसी विशेष पात्र में दीपक जलाकर उसे रस्सी के सहारे बांस की ऊंचाई पर लटका दिया जाता था।

इस परंपरा को आकाशप्रदीप या स्वर्गबाती कहा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक महीने भर जलने वाला यह दीपक परलोक में गए पूर्वजों को उनके घर का रास्ता दिखाता है, ताकि वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देने लौट सकें।

बंगाल में एक लोकप्रचलित कहावत है- ‘नाति स्वर्गे देबे बाति’। अर्थात नाती अपने दिवंगत दादा-दादी या नाना-नानी की आत्मा के निमित्त स्वर्ग में दीप जलाएगा। इस कहावत के पीछे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और उनके आशीर्वाद की कामना का भाव छिपा है। दरअसल, घर की भूमि से कुछ ऊंचाई पर दीपक जलाने की यह परंपरा पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक पारंपरिक माध्यम रही है। आकाश को स्वर्ग का प्रतीक मानकर बांस के ऊपरी सिरे पर रातभर दीप जलाया जाता है, ताकि पितरों को अपने घर तक पहुंचने का मार्ग दिखाई दे।

आकाशदीप जलाने की विधि भी अपने आप में विशेष है। कुछ स्थानों पर चौपल जलाकर उसे बांस के सिरे पर लटकाया जाता है। इसके लिए बांस के ऊपरी हिस्से में एक गोल छल्ला बनाया जाता है, जिसमें रस्सी डालकर दीपाधार को बांधा जाता है। रस्सी का दूसरा सिरा बांस के निचले हिस्से तक रहता है। शाम को उसे खींचकर दीपक ऊपर चढ़ाया जाता है और सुबह नीचे उतार लिया जाता है। परंपरा के अनुसार, इसके लिए लगभग 25 गांठों या पर्वों वाला नया बांस इस्तेमाल किया जाता है। बांस की ऊपरी लंबाई को यथासंभव सुरक्षित रखा जाता है। घर की महिलाएं संध्या के समय दीप जलाकर उसे आकाश की ओर उठाती हैं।

हालांकि, अब यह परंपरा धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही है। आधुनिक जीवनशैली के साथ हमारी पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियों और परंपराओं से जुड़ाव भी कमजोर हुआ है। हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं, अपनी जड़ों से उतने ही दूर होते दिखाई दे रहे हैं। कभी गांवों और कस्बों के लगभग हर घर में कार्तिक महीने की शाम को आकाशदीप जलता था। पिछले दशक के शुरुआती वर्षों तक कोलकाता के अनेक पुराने घरों की छतों पर भी आश्विन के अंतिम दिन से कार्तिक के अंतिम दिन तक यह परंपरा निभाई जाती थी। अब इसका स्थान धीरे-धीरे आधुनिक रोशनी और दूसरे सजावटी साधनों ने ले लिया है।

पंचतत्व और विष्णु की आराधना का प्रतीक आकाशदीप के पीछे धार्मिक और दार्शनिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। शास्त्र के जानकारों के अनुसार, मिट्टी का यह दीपक स्वयं मानव शरीर का प्रतीक है। भारतीय दर्शन में माना गया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- इन पांच तत्वों से मानव शरीर का निर्माण हुआ है। उसी तरह मिट्टी का दीपक भी इन पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करता है। मिट्टी उसका शरीर बनाती है, जल उसे आकार देता है, अग्नि उसकी आत्मा के समान है, वायु उसकी लौ को प्रज्वलित रखती है और आकाश उसके अस्तित्व का विस्तार करता है।

आकाशदीप को भगवान विष्णु की आराधना से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि कार्तिक महीने में आकाश में लक्ष्मी के साथ विराजमान भगवान विष्णु के सम्मान में यह दीप अर्पित किया जाता है। इस अवसर पर एक पारंपरिक मंत्र का उच्चारण भी किया जाता है- ‘आकाशे सलक्ष्मीक विष्णोस्तोषार्थं दीयमाने प्रदीपः…’ अर्थात लक्ष्मी के साथ आकाश में विराजमान भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए यह दीप अर्पित किया जा रहा है।

इस परंपरा के पीछे कई लोकविश्वास प्रचलित हैं। कार्तिक महीने में दिन छोटे और रातें लंबी होने लगती हैं। पुराने समय में जब बिजली और रोशनी के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब ऊंचाई पर जलाया गया दीपक अंधेरे में प्रकाश का एक स्रोत भी बनता था। इसी समय धान की फसल पकने और कटाई का मौसम आता है। ग्रामीण समाज में धान को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। इसलिए किसान अपनी फसल और घर-परिवार की समृद्धि के लिए लक्ष्मी-नारायण की आराधना करते हुए आकाशदीप जलाते थे। विश्वास था कि इसकी रोशनी से भगवान लक्ष्मी-नारायण उनके घर को पहचान सकेंगे और उनकी कृपा से घर धन-धान्य से परिपूर्ण होगा।

एक अन्य मान्यता के अनुसार, इस समय फसल को सुरक्षित रखने के लिए देवसेनापति कार्तिकेय की आराधना की जाती है। घर की छत, आंगन और ऊंचे स्थानों पर दीप जलाकर उनसे फसल की रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

परंपरा का वैज्ञानिक आधारआकाशदीप जलाने के पीछे कुछ व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं। कार्तिक महीने में धान पकने और फसल कटने के दौरान खेतों में अनेक प्रकार के कीट-पतंगे सक्रिय हो जाते हैं। मौसम में बदलाव के कारण कई तरह के कीट और रोगाणु भी फैलते हैं। ऐसे समय में सरसों, अरंडी या तिल के तेल का दीपक जलाने से निकलने वाली गंध कुछ कीटों को आकर्षित कर सकती है या दूर रख सकती है। विशेष रूप से इस मौसम में दिखाई देने वाले श्यामापोका जैसे कीट दीपक की लौ की ओर आकर्षित होकर उसमें गिर जाते हैं।

आकाशदीप की परंपरा को सर्दियों के आगमन से पहले अग्नि के संरक्षण की प्राचीन मानवीय प्रवृत्ति से भी जोड़कर देखा जाता है। कुछ तर्कवादी इसे हेमंत ऋतु के स्वागत और शीतकाल की तैयारी के प्रतीकात्मक उत्सव के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार, आग और ताप को सुरक्षित रखने की आदिम परंपरा समय के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान का रूप लेती चली गई।

मणिपुर में भी है आकाशदीप की परंपराआकाशदीप की परंपरा केवल बंगाल तक सीमित नहीं है। मणिपुर में इसे ‘केड़केड़ा’ कहा जाता है। कार्तिक महीने में मैतेई और विष्णुप्रिया वैष्णव समुदायों के लोग शाम होते ही बांस के ऊपरी सिरे पर लालटेन जलाकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और उनका आशीर्वाद मांगते हैं।

आकाशदीप स्थापित करते समय कुछ लोग एक अन्य पारंपरिक मंत्र का भी उच्चारण करते हैं-‘निवेद्य धर्मराजाय भूम्यै दामोदरायाप्यथ धर्मराजे।प्रजापतिभ्यस्तथ सत्पितृभ्यः प्रेतेभ्य एवाथ तमः स्थितेभ्यः॥’इस मंत्र में भगवान दामोदर, धर्मराज, प्रजापति, पितरों और दिवंगत आत्माओं के प्रति दीप अर्पित करने का भाव निहित है।

पितरों की वापसी का मार्ग दिखाता है दीपआकाशदीप की परंपरा का एक महत्वपूर्ण पक्ष पितृ-स्मरण है। मान्यता है कि आश्विन महीने की अमावस्या यानी महालया के दिन तर्पण के माध्यम से पूर्वजों का आह्वान किया जाता है। इसके बाद कार्तिक महीने में वे अपने वंशजों के बीच आते हैं और पारिवारिक उत्सवों में प्रतीकात्मक रूप से सहभागी होते हैं। लोकमान्यता में पितरों की इस परंपरा के अंतर्गत माता-पिता, दादा-दादी, परदादा-परदादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों के साथ सास-ससुर को भी स्मरण किया जाता है। इसके बाद भूत चतुर्दशी और दीपावली की अमावस्या के आसपास उनके लौटने की कल्पना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि पितृलोक और प्रेतलोक की ओर वापस जाते समय अंधेरी रात में उन्हें रास्ता दिखाने के लिए आकाशदीप जलाया जाता है। इस तरह यह दीप केवल पूजा का एक साधन नहीं, बल्कि जीवित और दिवंगत पीढ़ियों के बीच भावनात्मक संबंध का प्रतीक भी है।

दीपावली के अवसर पर प्राचीन काल में उल्कादान की परंपरा भी प्रचलित थी। इसे आकाशदीप दान का ही एक दूसरा रूप माना जाता है। मान्यता थी कि महालया के समय पृथ्वी पर आए पितर उल्कादान की रोशनी में अपने लोक की ओर लौटते हैं। ऐसी भी लोकधारणा रही है कि अकाल मृत्यु या दुर्घटना में मारे गए जिन लोगों को सद्गति नहीं मिली, वे इस दीप की ऊष्मा से मुक्ति प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर एक मंत्र का उच्चारण किया जाता रहा है- ‘अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।उज्ज्वल ज्योतिषा दग्धास्ते यान्तु परमां गतिम्॥’अर्थात मेरे कुल में जिन लोगों का अग्नि संस्कार हुआ है और जिनका नहीं हुआ, वे सभी इस उज्ज्वल ज्योति के प्रभाव से परम गति को प्राप्त हों।

साहित्य और संगीत में भी रही है आकाशदीप की उपस्थितिआकाशदीप केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा। साहित्य और संगीत में भी इस परंपरा की छाप दिखाई देती है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर सुरसम्राज्ञी लता मंगेशकर के गीतों तक, आकाशदीप की कल्पना ने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में स्थान पाया है। यह दीप कभी विरह का प्रतीक बना, कभी स्मृतियों का और कभी दूर बैठे किसी अपने के लौट आने की प्रतीक्षा का। लेकिन आज स्थिति यह है कि आकाशदीप का नाम और उसकी परंपरा ही धीरे-धीरे विस्मृति के अंधेरे में खोती जा रही है। कुछ वर्ष पहले तक भी कई घरों में औपचारिक रूप से बांस के सिरे पर बिजली का बल्ब लगाकर इस परंपरा को निभाया जाता था। अब वह दृश्य भी दुर्लभ होता जा रहा है।

आकाशदीप बनाने वाले एक कुुम्हार ने बताया कि 10-15 वर्ष पहले तक गांवों और कस्बों में आकाशदीप के लिए विशेष रूप से बनाए जाने वाले मिट्टी के घड़ों की अच्छी मांग थी। लेकिन अब मांग इतनी घट गई है कि कई कुम्हार इन्हें पहले से बनाकर रखने से भी परहेज करते हैं। परंपरा के लुप्त होने का असर मिट्टी के उन पात्रों पर भी पड़ा है, जो कभी इस अनुष्ठान की पहचान हुआ करते थे।

हेमंत की ठंडी शामों में जब अंधेरा धीरे-धीरे धरती को अपने आगोश में लेता है, तब आकाशदीप की अनुपस्थिति कुछ अधिक ही खलती है। मन में सवाल उठता है कि यदि यह दीप नहीं जलेगा तो लोकविश्वास के अनुसार परलोक से लौटने वाले हमारे पूर्वज अपने घर का रास्ता कैसे पहचानेंगे? रात के अंधेरे में उड़ान भरने वाले परिंदों को भी तो कभी दूर से दिखाई देने वाली रोशनी दिशा का एहसास कराती होगी।

दरअसल, आकाशदीप महज मिट्टी के पात्र में जलती हुई एक लौ नहीं है। यह हमारी स्मृतियों, सांस्कृतिक विरासत, पारिवारिक रिश्तों और पीढ़ियों के बीच आस्था के उस अदृश्य सूत्र का प्रतीक है, जो इहलोक को परलोक से जोड़ता है। आज जब आधुनिकता की तेज रोशनी में हमारी अनेक पुरानी परंपराएं धुंधली पड़ रही हैं, तब आकाशदीप का बुझना केवल एक धार्मिक रिवाज का अंत नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जाने का संकेत भी है।

कभी घरों की छतों पर रातभर जगमगाने वाली यह स्वर्गबाती आज स्वयं अपने अस्तित्व को बचाने के लिए मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही है। अब जरूरत है कि हम इस परंपरा को केवल अतीत की स्मृति बनाकर न छोड़ें, बल्कि इसके सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।-