highcort

कोलकाता, 01 अक्टूबर। दमदम स्थित कोलकाता हवाईअड्डे के पास करीब 50 साल पुरानी मस्जिद में नमाज रोके जाने का विवाद अब कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुंच गया है। हवाईअड्डा अधिकारियों ने सुरक्षा जोखिमों का हवाला देते हुए बीते 11 जुलाई से वहां नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी है। इस मामले में धार्मिक आचरण की अनुमति मांगने वाली याचिका पर गुरुवार को न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में जोरदार बहस हुई, हालांकि, अदालत ने अभी कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को हाेगी।

हवाईअड्डे के अंदर मस्जिद में नमाज के मुद्दे पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी स्थिति पहले ही स्पष्ट करते हुए कहा है कि सरकार किसी को भी अपने धर्म का पालन करने से नहीं रोक रही है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और हवाईअड्डे की सुरक्षा को हर हाल में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील किशोर दत्त ने दलील दी कि जिस मस्जिद में पिछले 40-50 वर्षों से लगातार प्रार्थना हो रही थी, वहां अचानक नमाज बंद कर दी गई है। उन्होंने बताया कि लोग हवाईअड्डे के गेट नंबर 8 से होकर नमाज पढ़ने जाते थे। वकील ने दावा किया कि संबंधित जमीन का अभी तक औपचारिक रूप से अधिग्रहण भी नहीं हुआ है। उन्होंने प्रार्थना को पूरी तरह से बंद कर देने को अन्यायपूर्ण बताते हुए सवाल उठाया कि जब पिछले 50 वर्षों में कभी सुरक्षा बाधित नहीं हुई, तो अब अचानक यह सवाल क्यों खड़ा किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से अपील की कि सुरक्षा जांच और कड़े नियंत्रण के साथ लोगों को फिलहाल मस्जिद में प्रवेश की अनुमति दी जाए।

दूसरी ओर, हवाईअड्डा प्राधिकरण के वकील गोपाल मुखोपाध्याय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि उस मस्जिद में सिर्फ प्रार्थना ही नहीं होती, बल्कि वहां बैठकें भी आयोजित की जाती हैं। उन्होंने सुरक्षा में सेंधमारी का बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि कई बार लोग रनवे तक पहुंच जाते हैं, जो विमानन सुरक्षा के लिहाज से एक गंभीर खतरा है। केंद्र सरकार की तरफ से भी अदालत में इसे सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बताया गया।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने सुरक्षा चिंताओं से सहमति जताते हुए हाल ही में हुए विमान हाईजैक के प्रयास का संदर्भ दिया। उन्हाेंने कहा कि आज के समय में सुरक्षा में चूक एक वैश्विक चिंता का विषय है और कल ही दुबई फ्लाइट में घटी घटना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने फिलहाल कोई राहत देने से इनकार कर दिया। —-