खड़गपुर, 25 सितंबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अर्बाना-शैंपेन (यूआईयूसी) के शोधकर्ताओं के सहयोग से एक अत्यधिक संवेदनशील फोटोनिक क्रिस्टल आधारित सेंसर विकसित किया है। यह तकनीक सामान्य स्मार्टफोन कैमरे की मदद से बेहद कम मात्रा में मौजूद पदार्थों की पहचान करने में सक्षम हो सकती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस फोटोनिक प्लेटफॉर्म में प्रकाश और पदार्थ के बीच होने वाली अंतःक्रिया को करीब 1,300 गुना तक बढ़ाया जा सकता है। इससे रोडामाइन रिपोर्टर अणुओं से मिलने वाले फ्लोरेसेंस संकेतों को बढ़ाया जाता है और पदार्थों की पहचान एटोमोलर स्तर यानी 10⁻¹⁸ मोल प्रति लीटर तक की सांद्रता में की जा सकती है।
शनिवार सुबह आईआईटी खड़गपुर द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस तकनीक का उपयोग कम लागत वाले और आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाए जा सकने वाले जांच उपकरण विकसित करने में किया जा सकता है। विशेष रूप से स्वास्थ्य जांच और रोगों की शुरुआती पहचान के क्षेत्र में इसके उपयोग की संभावना है। स्मार्टफोन की व्यापक उपलब्धता को देखते हुए इस तकनीक को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग के साथ जोड़कर भविष्य में कई तरह की जांच प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने बताया कि इस तकनीक के केंद्र में फोटोनिक क्रिस्टल है। यह बेहद सूक्ष्म संरचनाओं की एक नियमित व्यवस्था से तैयार होता है। इन संरचनाओं का आकार मानव बाल के व्यास से करीब एक हजार गुना छोटा है। प्रकृति में भी ऐसी प्रकाशीय संरचनाएं तितली के पंख, मोर के पंख, सी-माउस और ओपल जैसे पदार्थों में दिखाई देती हैं।
आईआईटी खड़गपुर के प्रो. शिवकिरण भक्त और उनका शोध समूह सेंसिंग के लिए फोटोनिक संरचनाओं के डिजाइन और निर्माण पर काम कर रहा है। इस विशेषज्ञता को यूआईयूसी के प्रो. ब्रायन टी. कनिंघम और उनके शोध समूह की जैव-नैनोफोटोनिक्स विशेषज्ञता से जोड़ा गया। इसके बाद फोटोनिक क्रिस्टल को सोना, टाइटेनिया और ग्राफीन ऑक्साइड के नैनोकणों की मदद से और विकसित किया गया।
इन नैनोसंरचनाओं के कारण प्रकाश के अत्यधिक संकेंद्रित क्षेत्र बनते हैं। इससे प्रकाश और पदार्थ के बीच होने वाली अंतःक्रिया काफी बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप बहुत कमजोर फ्लोरेसेंस संकेतों को भी मजबूत प्रकाशीय संकेतों में बदला जा सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक की खासियत यह है कि बेहद कम सांद्रता वाले पदार्थों की पहचान के लिए महंगे और अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों की आवश्यकता कम हो सकती है। फ्लोरेसेंस संकेतों के पर्याप्त प्रवर्धन के कारण सामान्य स्मार्टफोन कैमरे को ही सेंसर के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना बनती है।
इस तकनीक से छोटे आकार के जांच उपकरण और पोर्टेबल सेंसिंग प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा उन क्षेत्रों में भी इसका उपयोग संभव है, जहां कम लागत में तेजी से और अत्यंत कम मात्रा में मौजूद पदार्थों की पहचान की आवश्यकता होती है।
इस शोध में डॉ. सुधा मारिया लिस एस., डॉ. वेनान लियू, डॉ. सीमेश भास्कर और श्री सोमनाथ पंडित ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शोध को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एडवांस्ड ऑप्टिकल मैटेरियल्स में प्रकाशित किया गया है। इसे पत्रिका के कवर फीचर के रूप में भी स्थान मिला है।
