—वोटर्स की खामोशी, भितरघात और निर्दलीयों ने बिगाड़ा दोनों दलों का गणित; डेढ़ लाख से ज्यादा युवा वोटर लिखेंगे उदयपुर की सियासी पटकथा
उदयपुर, 10 सितम्बर (कौशल मूंदड़ा)। नगर निगम चुनाव में मुकाबला भले ही मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच नजर आ रहा हो, लेकिन इस बार चुनावी गणित कई परतों में उलझा हुआ है। तीन दशक में छह बार निगम की सत्ता हासिल कर चुकी भाजपा के सामने जहां अपना सियासी किला बचाने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस के लिए वापसी की राह आसान नहीं है। दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने वोट बैंक को एकजुट रखने की है। मतदाताओं की खामोशी, भीतरघात और निर्दलीयों की मौजूदगी ने चुनावी तस्वीर को दिलचस्प बना दिया है।
उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों में पार्षद चुनने के लिए मतदान होना है। मैदान में कुल 220 प्रत्याशी हैं। भाजपा और कांग्रेस के 160 उम्मीदवार हैं, जबकि शेष सीटों पर बाप, माकपा और निर्दलीय प्रत्याशी मुकाबले में हैं। 39 वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है, लेकिन कई वार्डों में बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने मुकाबले को त्रिकोणीय और बहुकोणीय बना दिया है।
भाजपा के सामने वर्चस्व बचाने की परीक्षा
—उदयपुर नगर निगम की राजनीति में भाजपा का दबदबा किसी से छिपा नहीं है। पिछले 30 वर्षों में छह बार भाजपा का बोर्ड बना है। इससे पहले 1964 से 1967 तक भी भाजपा का बोर्ड था। यही पुराना रिकॉर्ड इस बार पार्टी के लिए सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी। लगातार सत्ता में रहने के बाद मतदाताओं के बीच सत्ता विरोधी रुझान कितना है, यह चुनाव परिणाम में सामने आएगा। भाजपा के सामने सिर्फ अधिक सीटें जीतने की चुनौती नहीं है, बल्कि अपने मजबूत गढ़ को बचाए रखने की भी परीक्षा है। टिकट वितरण के बाद नाराजगी और बागी तेवरों ने पार्टी के सामने कुछ सीटों पर चुनौती बढ़ाई है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन अपने अधिकृत प्रत्याशियों के पक्ष में वोटों को कितना एकजुट रख पाता है।
कांग्रेस के लिए वापसी की राह में कई रोड़े
—कांग्रेस के सामने लक्ष्य बड़ा है—नगर निगम की सत्ता को पाना। लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे भाजपा के मजबूत संगठन और पुराने जनाधार को चुनौती देनी होगी। कई वार्डों में कांग्रेस के सामने अपने ही खेमे की नाराजगी और बागी प्रत्याशियों से निपटने की चुनौती है। यानी कांग्रेस भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करने में कामयाब रहती है या वे वोट निर्दलीयों और अन्य प्रत्याशियों में बंट जाते हैं, यही चुनावी गणित का अहम हिस्सा रहेगा।
निर्दलीय न बन जाएं ‘गेमचेंजर’!
—इस बार निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी कई वार्डों में दोनों प्रमुख दलों का खेल बिगाड़ सकती है। जहां मुकाबला बेहद करीबी है, वहां कुछ सौ वोट भी जीत-हार का अंतर तय कर सकते हैं। ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशी सिर्फ तीसरा कोण नहीं, बल्कि कई वार्डों में गेमचेंजर की भूमिका में नजर आ सकते हैं।
भितरघात का डर भी कम नहीं
—टिकट वितरण के बाद सामने आई नाराजगी और स्थानीय स्तर की गुटबाजी ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की चिंता बढ़ाई है। चुनाव मैदान में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के सामने उसी दल से जुड़े बागी का उतरना केवल एक सीट का मुकाबला नहीं बदलता, बल्कि पार्टी के भीतर की एकजुटता की भी परीक्षा लेता है। ऐसे में सवाल यह है कि पार्टी के झंडे और चुनाव चिह्न के पीछे पूरा संगठन खड़ा है या भीतर ही भीतर किसी और उम्मीदवार के लिए वोटों का खेल चल रहा है?
मतदाताओं की चुप्पी ने बढ़ाई बेचैनी
—चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों ने अपने-अपने पक्ष में माहौल होने के दावे जरूर किए, लेकिन मतदाताओं का बड़ा वर्ग अब भी खुलकर अपना रुख जाहिर करता नजर नहीं आया। यही खामोशी राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा रही है। किसके पक्ष में मौन मतदाता मतदान करता है, यह अंतिम समय तक साफ नहीं होगा। यही कारण है कि दोनों प्रमुख दल बूथ स्तर तक अपने वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की रणनीति पर जोर दे रहे हैं।
डेढ़ लाख से ज्यादा युवा वोटर सबसे बड़ा फैक्टर
—इस चुनाव में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। नगर निगम क्षेत्र में 35 वर्ष से कम उम्र के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 35 फीसदी है। यानी डेढ़ लाख से ज्यादा युवा मतदाता अपने वोट से चुनावी समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं।
युवा रोजगार, शहर के विकास, यातायात, पर्यटन, सफाई, मूलभूत सुविधाओं और भविष्य के अवसरों जैसे मुद्दों पर किसे चुनते हैं, यह दोनों दलों के लिए अहम होगा।
नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर
—भाजपा में सांसद डॉ. मन्नालाल रावत, शहर भाजपा जिलाध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा और शहर विधायक ताराचंद जैन की राजनीतिक प्रतिष्ठा इस चुनाव से जुड़ी है। वहीं कांग्रेस में शहर जिलाध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ और देहात जिलाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद रघुवीर सिंह मीणा के लिए भी यह चुनाव संगठनात्मक ताकत दिखाने की परीक्षा है।
असली मशक्कत वोटर्स को बूथ तक पहुंचाने की
—अब मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि कौन अपने वोटरों को बूथ तक पहुंचाएगा, किसके बागी कितनी सेंध लगाएंगे और निर्दलीय किसका खेल बिगाड़ेंगे।
उदयपुर की जनता का फैसला ईवीएम में कैद होगा, लेकिन इस बार नतीजे कई सियासी समीकरणों का इम्तिहान लेने वाले हैं। भाजपा अपना पुराना वर्चस्व बचा पाएगी या कांग्रेस वापसी का रास्ता बनाएगी—इसका जवाब मतदान के बाद ही मिलेगा। मगर इतना तय है कि इस बार उदयपुर की सियासी बाजी में खामोश मतदाता, युवा वोट और बागी तेवर सबसे बड़े निर्णायक बन सकते हैं।
