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झाड़ग्राम/मेदिनीपुर, 13 फरवरी । पश्चिम मेदिनीपुर और झाड़ग्राम जिलों में रोड आइलैंड रेड नस्ल की मुर्गियों का पालन ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बनकर उभरा है। प्रशासनिक सहयोग और बैंक ऋण की सहायता से स्वयं सहायता समूह न केवल अपनी आय बढ़ा रहे हैं, बल्कि क्षेत्र में पोषण और रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर रहे हैं।

पश्चिम मेदिनीपुर के शालबनी ब्लॉक में भादुतला हाई स्कूल के समीप सुषमा महतो के नेतृत्व में दस महिलाओं ने घर के पास शेड बनाकर मुर्गी फार्म स्थापित किया है। यहां सबिता पात्र, ममता, तृप्ति, मयना और झुम्पा सहित अन्य सदस्याएं नियमित रूप से काम करती हैं। छह माह के भीतर ही फार्म लाभ देने लगा है। यह नस्ल सालाना औसतन 200 से 220 अंडे देती है, जिससे समूह की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

समूह की दलनेत्री सबिता पात्र ने बताया कि वर्ष 2007 में ‘बाबा लोकनाथ महिला स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया गया था। प्रारंभ में अन्य कार्यों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन बाद में मुर्गी पालन ने स्थायी आय का रास्ता दिखाया। सह-दलनेत्री सुषमा महतो के अनुसार, समूह को बैंक से 15 लाख रुपये का ऋण और डेढ़ लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता मिली है, जिससे आधारभूत ढांचा तैयार किया गया। अंडों की बाजार में अच्छी मांग है और बिक्री संतोषजनक हो रही है।

इसी प्रकार झाड़ग्राम जिले के बिनपुर-दो ब्लॉक और बेलपहाड़ी क्षेत्र में भी पशुपालन विभाग की पहल पर बड़ी संख्या में आदिवासी एवं जनजातीय परिवारों को रोड आइलैंड रेड नस्ल के चूजे वितरित किए गए हैं। वर्ष 2024-25 में लगभग 2 हजार 600 लाभार्थियों को चूजे दिए गए, जबकि चालू वित्त वर्ष में करीब तीन हजार लोगों को मुर्गी एवं बकरी पालन से जोड़ा गया है। यह नस्ल सालाना 150 से 200 अंडे देती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर मानी जाती है।

बिनपुर-दो के बीएलडीओ डॉ. शिवशंकर सोरेन ने बताया कि क्षेत्र की बड़ी आबादी आर्थिक रूप से कमजोर है। पशुपालन के माध्यम से कुपोषण और गरीबी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। पर्यटन गतिविधियों में वृद्धि के कारण होटल, लॉज और रिसॉर्ट में अंडे और मांस की मांग बढ़ी है, जिससे ग्रामीणों को बेहतर बाजार उपलब्ध हो रहा है।

शालबनी के बीडीओ रोमान मंडल ने भी स्वयं सहायता समूहों की सराहना करते हुए कहा कि प्रशासन की ओर से पशुपालन विभाग के सहयोग से नियमित मार्गदर्शन, आहार और चिकित्सा सहायता प्रदान की जा रही है।

दोनों जिलों में मुर्गी पालन की यह पहल अब केवल आय का साधन नहीं रही, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के आत्मविश्वास, स्वावलंबन और सामाजिक सशक्तिकरण का प्रतीक बनती जा रही है।