नई दिल्ली, 01 अक्टूबर। स्कूली पाठ्यपुस्तक में दर्ज एक-एक शब्द विद्यार्थी के लिए इतिहास की समझ का आधार बनता है। ऐसे में एनसीईआरटी की कक्षा 11वीं की एच्छिक हिंदी पाठ्यपुस्तक ‘अंतरा’ भाग-2 चेप्टर-5 में सुधा अरोड़ा की रचना ‘ज्योतिबा फुले’ के कुछ अंश गंभीर अकादमिक सवाल खड़े करते हैं। विवाद का केंद्र पाठ में किए गए दावों के स्रोत, भाषा और ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा है।
खास तौर पर एनसीईआरटी की कक्षा 11वीं की एच्छिक हिंदी पाठ्यपुस्तक में ‘पांच समाज सुधारकों’, ‘उच्चवर्णीय समाज’, ‘पुरोहितवाद’ और ‘ब्राह्मणवाद’ से जुड़ी भाषा की प्रस्तुति विवाद का मुख्य कारण है, जिसके बाद से लगातार इस पाठ को लेकर आक्रोश नजर आ रहा है। दूसरी ओर इस सबंध में जब एनसीईआरटी के अधिकारियों से बातकर उनका पक्ष मांगा गया तो कोई भी इस बारे में कुछ नहीं बोला।
पाठ की शुरुआत में लिखा है, “यह अप्रत्याशित नहीं है कि भारत के सामाजिक विकास और बदलाव के आंदोलन में जिन पाँच समाज-सुधारकों के नाम लिए जाते हैं, उनमें महात्मा ज्योतिबा फुले के नाम का शुमार नहीं है। इस सूची को बनाने वाले उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि हैं।” यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। आखिर वे पांच समाज सुधारक कौन हैं? सूची किस संस्था, विद्वान, आयोग या दस्तावेज ने तैयार की? उसका प्रकाशन कब हुआ? सूची तैयार करने वालों को ‘उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि’ किस आधार पर कहा गया?
पाठ में इन सवालों के साथ कोई स्पष्ट स्रोत, तिथि या दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने की जानकारी उपलब्ध अध्ययन में दर्ज नहीं है। ऐसे में विद्यार्थी के सामने दावा मौजूद है, उसके सत्यापन का आधार अस्पष्ट है।
‘उच्चवर्णीय समाज’ का निष्कर्ष किस प्रमाण पर?
इस संबंध में सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि किसी ऐतिहासिक सूची के निर्माताओं को एक सामाजिक वर्ग से जोड़ना अपने आप में एक तथ्यात्मक दावा है। पाठ में इसके समर्थन में विशिष्ट नाम या दस्तावेज का उल्लेख दिखाई नहीं देता। अध्ययन इसी बिंदु को सामान्यीकरण की समस्या के रूप में चिन्हित करता है। ऐसे में स्कूली पुस्तक में ऐसे दावे का प्रभाव व्यापक होता है। विद्यार्थी पुस्तक में लिखी सामग्री को प्रामाणिक मानकर आगे बढ़ता है। स्रोत और संदर्भ स्पष्ट होने पर वह तथ्य और लेखक की व्याख्या के बीच अंतर समझ सकता है, जिसका कि यहां पूरी तरह से अभाव है।
फुले के संदर्भ में पुस्तक में लिखा है, “ज्योतिबा फुले ब्राह्मण वर्चस्व और सामाजिक मूल्यों को कायम रखनेवाली शिक्षा और सुधार के समर्थक नहीं थे।” यहां ‘सामाजिक मूल्य’ शब्द खास ध्यान खींचता है। अध्ययन के अनुसार सामाजिक मूल्य का सामान्य अर्थ न्याय, सत्य, करुणा, बंधुत्व और परोपकार जैसे सकारात्मक मानवीय मूल्यों से जुड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि लेखक का आशय तत्कालीन सामाजिक रूढ़ियों से था या व्यापक सामाजिक मूल्यों से? यदि आशय रूढ़ियों और कुरीतियों से था तो उसी अर्थ को स्पष्ट करने वाली शब्दावली पाठ को अधिक सटीक बना सकती थी। अस्पष्ट भाषा विद्यार्थी के सामने अर्थ का अलग संकट खड़ा करती हुई नजर आ रही है।
‘पुरोहित’ और ‘पुरोहितवाद’ एक ही अर्थ रखते हैं?
अध्ययन में ‘पुरोहित’ शब्द के पारंपरिक अर्थ और आधुनिक राजनीतिक विमर्श में ‘पुरोहितवाद’ के अर्थ के बीच अंतर पर भी ध्यान दिया गया है। भारतीय परंपरा में ‘पुरोहित’ को लोककल्याण, धर्म, न्याय और सामाजिक दायित्व से जुड़े व्यक्ति के रूप में व्याख्यायित किया गया है। दूसरी ओर आधुनिक विमर्श में ‘पुरोहितवाद’ शब्द का प्रयोग शोषण, पाखंड, कर्मकांड और वर्चस्व जैसे अर्थों के साथ किया जाता रहा है। पाठ्यपुस्तक में ऐसे शब्द का इस्तेमाल करते समय उसके ऐतिहासिक और दार्शनिक संदर्भ की व्याख्या विद्यार्थी को नहीं दी गई, जिसके चलते उसे एक तय अर्थ ग्रहण करने के लिए छोड़ दिया गया है!
‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ के बीच अंतर कहां है?
भारतीय ज्ञान परंपरा में ‘ब्राह्मण’ शब्द को ज्ञान, साधना, आत्मसंयम और आध्यात्मिक उपलब्धि से जोड़ गया है, जबकि इस चेप्टर में लेखिका सुधा अरोड़ा ने आधुनिक राजनीतिक विमर्श में प्रयुक्त ‘ब्राह्मणवाद’ की अवधारणा और पारंपरिक ‘ब्राह्मण’ शब्द को एक ही अर्थ-क्षेत्र में देखने से ऐतिहासिक अर्थों का सरलीकरण कर दिया है। किसी सामाजिक कुरीति की आलोचना और पूरे समुदाय अथवा परंपरा के मूल्यांकन के बीच स्पष्ट रेखा विद्यार्थी को दिखाई देनी चाहिए थी, जिसका कि यहां सीधा अभाव दिखाई देता है।
बालमन पर असर का सवाल भी गंभीर
इस संबंध में इतिहास एवं पुरातत्व के वरिष्ठ अध्येता प्रो. आनन्द सिंह राणा ने उक्त अध्ययन में 16 से 18 वर्ष की आयु के विद्यार्थियों को वैचारिक रूप से संवेदनशील बताते हुए आशंका जताते हुए कहा, “पाठ्यपुस्तक में किसी समुदाय या सामाजिक वर्ग के संबंध में लगातार नकारात्मक संकेत ‘हम बनाम वे’ जैसी मानसिकता को बढ़ा सकते हैं। इससे संबंधित समुदाय के विद्यार्थियों में हीनभावना तथा दूसरे विद्यार्थियों में पूर्वाग्रह पैदा होने की संभावना भी अध्ययन में दर्ज है।”
वे कहते हैं, “ज्योतिबा फुले के सामाजिक सुधार, महिला शिक्षा और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष का अध्ययन इतिहास और समाजशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय हो सकता है। सवाल फुले के योगदान की चर्चा पर नहीं, उस चर्चा के लिए चुने गए शब्दों, प्रमाणों और संदर्भों पर है, इसलिए अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में उपलब्ध अध्ययन पाठ्यपुस्तकों में भारतीय ज्ञान परंपरा, तथ्यात्मक प्रमाण, स्पष्ट शब्दावली और संतुलित ऐतिहासिक दृष्टिकोण की आवश्यकता रेखांकित करना जरूरी है। इसमें सुझाव यह है कि सामाजिक कुरीतियों और सुधार आंदोलनों की चर्चा करते समय जाति, व्यक्ति, सामाजिक व्यवस्था और ऐतिहासिक परिस्थिति के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।”
दूसरी ओर वहीं, मनोचिकित्सक डॉ. अनुकंपा मिश्रा कहती हैं, “विद्यालयीन पुस्तकों में जब कोई ऐतिहासिक दावा लिखा जाए तो उसके साथ स्रोत भी सामने आना चाहिए। पुस्तक में लिखे शब्द, “इस सूची को बनाने वाले उच्चवर्णीय समाज के प्रतिनिधि हैं।” “ज्योतिबा फुले ब्राह्मण वर्चस्व और सामाजिक मूल्यों को कायम रखने वाली शिक्षा और सुधार के समर्थक नहीं थे।” अपने आप में विरोधाभास पैदा करते हैं।”
उल्लेखनीय है कि इसके अलावा इस पाठ में एक स्थान पर लिखा गया है कि सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।” ऐसे ही एक जगह पाठ में फुले द्वारा ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका से अलग विवाह पद्धति विकसित करने और नए मंगलाष्टक तैयार करने को सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि ऋग्वेद में नववधू को ‘साम्राज्ञी’ कहकर संबोधित किया गया है। साथ ही परंपरागत विवाह पद्धति लिखनेवाली महिलाएं ही हैं, जिसमें महिलाओं को पुरुषों से अधिक अधिकारा भी दिए गए हैं।
इसी तरह से फुले के ‘आदर्श परिवार’ की अवधारणा भी पाठ में चर्चा का विषय है। जिसमें कहा गया, घर में पिता बौद्ध, माता ईसाई, बेटी मुस्लिम और बेटा सत्यधर्मी होना चाहिए, जबकि इसमें बहुसंख्यक हिन्दू समाज का कोई जिक्र नहीं है। ऐसे में प्रश्न उठता है, इस उदाहरण का सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ क्या है? विद्यार्थी को आखिर क्या समझाया जा रहा है?
मनोचिकित्सक डॉ. अनुकंपा मिश्रा का इस बारे में कहना यही है कि पाठ्यपुस्तक का काम विद्यार्थी को किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति भावनात्मक प्रतिक्रिया के लिए तैयार करना नहीं है। उसका काम उसे प्रमाण, संदर्भ और तर्क के आधार पर सोचने की क्षमता देना है, जिसका कि इस पूरे पाठ में अभाव नजर आ रहा है।
