चार डस्टबिन मॉडल बनेगा स्वच्छ उदयपुर की नई पहचान
कौशल मूंदड़ा
उदयपुर, 8 मई। “यदि हर घर में केवल दो नहीं बल्कि चार डस्टबिन रखे जाएं, तो कचरे की सबसे बड़ी समस्या का समाधान संभव है।”
यह संदेश ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 विषय पर विद्या भवन पॉलिटेक्निक में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में गूंजा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 अब केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी तय करते हैं। उन्होंने बताया कि गत माह से प्रभावी हुए इन नियमों के तहत घरों, संस्थानों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर कचरे का चार-स्तरीय पृथक्करण अनिवार्य कर दिया गया है। नियमों की अनदेखी करने पर स्थानीय निकायों द्वारा जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
डॉ. मेहता ने कहा कि लंबे समय तक केवल गीले और सूखे कचरे को अलग करने की बात होती रही, लेकिन अब बदलती पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण अधिक वैज्ञानिक व्यवस्था अपनाना आवश्यक हो गया है। उन्होंने बताया कि यदि घरों में चार अलग-अलग डस्टबिन रखे जाएं तो कचरे का निस्तारण सरल होगा, पुनर्चक्रण की प्रक्रिया तेज होगी तथा लैंडफिल पर दबाव कम होगा। इससे शहर की स्वच्छता व्यवस्था में व्यापक सुधार संभव है।
उन्होंने विस्तार से बताया कि हरे रंग के डस्टबिन में रसोई का जैविक कचरा, सब्जियों और फलों के छिलके, बचा हुआ भोजन तथा फूल-पत्तियां डालनी चाहिए, जिससे खाद या बायोगैस तैयार की जा सके। नीले रंग के डस्टबिन में प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच, लकड़ी तथा रबर जैसे सूखे अपशिष्ट डालने चाहिए, जिन्हें पुनर्चक्रण के लिए उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त सैनिटरी एवं स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट जैसे डायपर, सैनिटरी पैड, टैम्पोन तथा कंडोम को अलग सुरक्षित पैकिंग में संग्रहित करना आवश्यक है। वहीं पेंट के डिब्बे, बल्ब, थर्मामीटर, दवाइयां तथा अन्य रासायनिक पदार्थों जैसे खतरनाक अपशिष्ट को अलग डस्टबिन में रखना चाहिए ताकि उनका सुरक्षित निस्तारण किया जा सके।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. मेहता ने प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वातावरण में बढ़ती प्लास्टिक की मात्रा अब सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। माइक्रो और नैनो प्लास्टिक के सूक्ष्म कण भोजन, पानी और सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न अध्ययनों के अनुसार एक व्यक्ति प्रति सप्ताह औसतन लगभग पांच ग्राम प्लास्टिक अनजाने में ग्रहण कर रहा है, जो भविष्य में अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शिक्षकों और विशेषज्ञों ने स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण तथा वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को लेकर गंभीर चर्चा की और नागरिकों से चार-स्तरीय कचरा पृथक्करण व्यवस्था अपनाने का आह्वान किया।
जागरूकता कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित स्लोगन एवं पोस्टर प्रस्तुत किए। “गंदगी को कहें अलविदा, स्वच्छता से रहें सदा”, “आज का कचरा-कल का खतरा”, “कचरा फेंको डस्टबिन में-डिसिप्लिन रखो जीवन में” तथा “क्लीन सिटी, ग्रीन सिटी-यही है हमारी रिस्पांसिबिलिटी” जैसे नारों ने कार्यक्रम में उत्साह का वातावरण बना दिया।
स्लोगन एवं पोस्टर प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों रक्षित, प्रिया, यश, हितार्थ, मनुप्रताप, सुमित, साक्षी, विश्वराज, गौरव, पीयूष एवं प्रिंस को पुरस्कृत किया गया।
कार्यक्रम में इलेक्ट्रिकल विभागाध्यक्ष प्रकाश सुंदरम सहित नितिन सनाढ्य, दर्शना शर्मा, पंकज कुमार सिंह, कमलेश कुमावत एवं नीरज वैष्णव ने भी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए स्वच्छता को सामाजिक जिम्मेदारी बताया और पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
चार डस्टबिन — किसमें क्या डालें
* हरा डस्टबिन : गीला कचरा — रसोई अपशिष्ट, फल-सब्जियों के छिलके, भोजन, फूल-पत्तियां
* नीला डस्टबिन : सूखा कचरा — प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच, लकड़ी, रबर
* नारंगी डस्टबिन : सैनिटरी कचरा — डायपर, सैनिटरी पैड, टैम्पोन, कंडोम
* लाल डस्टबिन : खतरनाक कचरा — पेंट, बल्ब, थर्मामीटर, दवाइयां, रसायन
चार प्रकार के कचरों का उपयोग
गीला कचरा — खाद / बायोगैस
सूखा कचरा — पुनर्चक्रण (Recycling)
सैनिटरी कचरा — विशेष निस्तारण
खतरनाक कचरा — हैजार्डस निस्तारण
फैक्ट फाइल
* ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 गत माह से लागू
* चार-स्तरीय कचरा पृथक्करण अब अनिवार्य
* नियमों की अवहेलना पर लगाया जा सकता है जुर्माना
* प्रति सप्ताह लगभग पांच ग्राम माइक्रो प्लास्टिक पहुंच रहा मानव शरीर में
* कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण से बढ़ेगा पुनर्चक्रण और घटेगा प्रदूषण
“उदयपुर को स्वच्छता में देश का अग्रणी शहर बनाना है तो हर घर में चार डस्टबिन की व्यवस्था अभी से शुरू करनी होगी।”
— डॉ. अनिल मेहता, प्राचार्य, विद्या भवन पॉलिटेक्निक
