कोलकाता, 18 सितंबर। तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके चुनाव चिह्न पर भारत निर्वाचन आयोग द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि आयोग के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक दल को निजी संपत्ति या प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह नहीं चलाया जा सकता और न ही उसे पारिवारिक विरासत के रूप में सौंपा जा सकता है।
पार्टी प्रतीक को लेकर छिड़े विवाद पर बोलते हुए बनर्जी ने कहा कि निर्वाचन आयोग का यह निर्णय पार्टी नेताओं के लिए भी बेहद अप्रत्याशित रहा।
उन्होंने कहा, “विमान से उतरते ही हमें सूचना मिली कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों फ्रीज कर दिए गए हैं। बहरहाल, एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि किसी भी लोकतंत्र के भीतर तानाशाही के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।”
ऋतब्रत बनर्जी ने आयोग के अंतरिम आदेश को राजनीतिक दलों के स्वामित्व और नियंत्रण की व्यापक बहस से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि पार्टी के नाम और निशान को लेकर जो नैरेटिव बनाया जा रहा था, उस पर आयोग के इस आदेश ने यह साबित कर दिया है कि वंशवादी राजनीति का दौर अब नहीं चल सकता। एक राजनीतिक दल कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं है और न ही उसका कोई पारिवारिक वारिस हो सकता है, यह बात आज पूरी तरह सिद्ध हो गई है।
उल्लेखनीय है कि निर्वाचन आयोग ने ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगाते हुए दोनों विरोधी पक्षों को विवाद सुलझने तक वैकल्पिक नाम और प्रतीक चुनने का निर्देश दिया है। आयोग का यह फैसला आगामी 6 अक्टूबर को राज्य के नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्रों में होने वाले उपचुनावों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अपने आदेश में निर्वाचन आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सभी तथ्यों और जानकारियों की समीक्षा के बाद आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के भीतर दो प्रतिद्वंद्वी गुट मौजूद हैं। इनमें से एक गुट का नेतृत्व ममता बनर्जी और दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं, और दोनों ही पक्ष पार्टी पर अपना दावा जता रहे हैं। इसी कारण चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश 1968 के पैरा 15 के तहत इस विवाद के विधिवत और ठोस निस्तारण की आवश्यकता है।
