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रांची, 26 अक्टूबर। झारखंड उच्च न्यायालय में सोमवार को 11वीं से 13वीं संयुक्त झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की मुख्य परीक्षा के परिणाम को रद्द करने की मांग से जुड़ी अपील पर सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अयूब तिर्की एवं अन्य की ओर से दाखिल अंतरिम आवेदन (आईए) खारिज कर दिया। इस आवेदन के जरिए अपीलकर्ताओं ने राज्य सरकार के परीक्षा रद्द करने संबंधी निर्णय को चुनौती देने वाले अलग मामले की सुनवाई भी अपनी अपील के साथ करने का आग्रह किया था।

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्होंने पहले मुख्य परीक्षा के परिणाम को रद्द करने की मांग की थी, जिसे एकल पीठ ने खारिज कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने संबंधित परीक्षा को रद्द करने का निर्णय लिया। सरकार के इस निर्णय को भी अलग से एकल पीठ में चुनौती दी गई है। अपीलकर्ताओं ने आग्रह किया कि दोनों मामले एक ही परीक्षा से संबंधित हैं, इसलिए उनकी सुनवाई एक साथ की जाए।

इस पर प्रतिवादी की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार के परीक्षा रद्द करने संबंधी निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर एकल पीठ सुनवाई पूरी कर चुकी है और फैसला सुरक्षित रखा गया है। खंडपीठ ने कहा कि जब एकल पीठ संबंधित मामले में आदेश सुरक्षित रख चुकी है, तो उसे वर्तमान अपील के साथ जोड़ने के आग्रह पर कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। इसके बाद अदालत ने अंतरिम आवेदन खारिज कर दिया।

उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने अक्टूबर 2025 में अयूब तिर्की और राजेश कुमार की ओर से दायर रिट याचिका खारिज कर दी थी। याचिका में 11वीं से 13वीं संयुक्त जेपीएससी मुख्य परीक्षा के मूल्यांकन में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए परीक्षा परिणाम रद्द करने की मांग की गई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए अयूब तिर्की एवं अन्य ने उच्च न्यायालय में लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) दायर की थी।

एकल पीठ ने उस समय दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा था कि याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित समय पर आपत्तियां दर्ज नहीं कराई थीं। साथ ही मूल्यांकन प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता नहीं पाई गई, जिसके आधार पर परीक्षा परिणाम रद्द किया जा सके। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया था।

सुनवाई के दौरान जेपीएससी की ओर से अधिवक्ता संजय पिपरवाल ने पक्ष रखते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता परीक्षा में असफल होने के बाद मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। यदि उन्हें परीक्षा पद्धति से आपत्ति थी, तो परिणाम घोषित होने से पहले ही आपत्ति दर्ज करानी चाहिए थी। आयोग का कहना था कि सभी अभ्यर्थियों के लिए समान नियम लागू किए गए थे और किसी के साथ भेदभाव नहीं हुआ था।

वहीं, याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि जेपीएससी ने परीक्षा नियमों के विपरीत डिजिटल मूल्यांकन कराया। क्षेत्रीय भाषाओं की उत्तरपुस्तिकाओं की जांच ऐसे परीक्षकों से कराई गई, जिनके पास निर्धारित अनुभव नहीं था। उनका कहना था कि नियमानुसार उत्तरपुस्तिकाओं की जांच कम से कम 10 वर्ष का अनुभव रखने वाले परीक्षकों से कराई जानी चाहिए थी। याचिकाकर्ताओं ने मूल्यांकन प्रक्रिया में गंभीर त्रुटियों और अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए परीक्षा परिणाम रद्द करने की मांग की थी।