kalia

कोलकाता, 07 नवंबर।

पश्चिम बंगाल में मां काली के अनेक प्राचीन और अनोखे मंदिर हैं, जिनकी अपनी अलग मान्यताएं और परंपराएं हैं। उत्तर कोलकाता के श्यामबाजार में भी मां काली का एक ऐसा ही अनोखा मंदिर है, जहां देवी अपने पारंपरिक उग्र स्वरूप के बजाय घूंघट ओढ़े शांत और सौम्य रूप में विराजमान हैं। घूंघट वाली मां काली के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर अपनी विशिष्ट प्रतिमा और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है।

श्यामबाजार के पांच माथा मोड़ से भूपेन बोस एवेन्यू होते हुए आगे बढ़ने पर महाराजा मणिंद्र चंद्र कॉलेज स्थित है। इसके ठीक विपरीत दिशा में श्यामपुकुर थाना है और थाने के सामने बलराम घोष स्ट्रीट पर यह प्राचीन मंदिर स्थित है। व्यस्त शहर की गलियों के बीच मौजूद इस मंदिर में प्रवेश करते ही एक अलग तरह की शांति का अनुभव होता है।

आमतौर पर मां काली की प्रतिमा में खुले बाल, गले में मुंडमाला और उग्र स्वरूप देखने को मिलता है, लेकिन इस मंदिर में मां का स्वरूप बिल्कुल अलग है। यहां देवी के सिर पर सुंदर घूंघट है और उनका चेहरा शांत, सौम्य तथा ममतामयी दिखाई देता है। इसी अनोखे स्वरूप के कारण देवी को घूंघट काली कहा जाता है।

मंदिर का इतिहास वर्ष 1888 से जुड़ा हुआ है। उस समय इस इलाके के प्रतिष्ठित जमींदार बलराम घोष के वंशज तुलसीराम घोष को एक रात स्वप्न में मां काली के दर्शन हुए। मान्यता है कि स्वप्न में देवी घूंघट ओढ़े हुए शांत और सौम्य स्वरूप में दिखाई दी थीं। इस दिव्य स्वप्न से प्रभावित होकर तुलसीराम घोष ने मां के इसी स्वरूप की प्रतिमा स्थापित करने का निर्णय लिया। इसके बाद स्वप्न में दिखाई दिए स्वरूप के अनुसार देवी की प्रतिमा बनवाई गई और मंदिर में उनकी स्थापना की गई।

आज भी मंदिर में पुरानी परंपराओं के अनुसार नियमित पूजा-अर्चना होती है। मां को भोग में बिना नमक की लुची, पांच प्रकार की भुजिया, बूंदी और विभिन्न मिठाइयां अर्पित की जाती हैं।

कार्तिक महीने की अमावस्या यानी काली पूजा के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा बसंत पंचमी के दिन भी यहां विशेष उत्सव आयोजित होता है। मान्यता है कि इसी दिन मंदिर की स्थापना हुई थी, इसलिए इस अवसर का विशेष धार्मिक महत्व है।

तंत्र साधकों से लेकर सामान्य श्रद्धालुओं तक के लिए यह मंदिर गहरी आस्था का केंद्र है। साधक मां को दक्षिणाकाली के शांत स्वरूप के रूप में पूजते हैं। वहीं, अनेक श्रद्धालु उन्हें स्नेहपूर्वक छोटी भवतारिणी भी कहते हैं। उत्तर कोलकाता के इस प्राचीन मंदिर में मां काली का घूंघट ओढ़े स्वरूप आज भी लोगों के लिए श्रद्धा, विश्वास और कौतूहल का विषय बना हुआ है।