कोलकाता, 24 अक्टूबर।
समय के साथ विजयादशमी की शुभकामनाएं देने का तरीका भी बदल गया है। एक समय था, जब दुर्गापूजा समाप्त होने के बाद लोग अपनों के पत्र और रंगीन पोस्टकार्ड का बेसब्री से इंतजार करते थे। आज व्हाट्सऐप पर एक संदेश, कुछ इमोजी और पुरानी तस्वीर के जरिए पलभर में शुभकामनाएं पहुंच जाती हैं। लेकिन इस तेज रफ्तार संवाद के बीच पत्रों के इंतजार का वह जादुई एहसास कहीं खो गया है। इसी भावुक स्मृति को साझा करते हुए राज्य की शहरी विकास मंत्री अग्निमित्रा पाल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक भावपूर्ण पोस्ट लिखा है।
अग्निमित्रा पाल ने लिखा कि अब विजयादशमी की शुभकामनाएं देने के लिए किसी अपने का पता खोजने और रंगीन पोस्टकार्ड भेजने की जरूरत नहीं पड़ती। कलम से मन की बातें लिखकर कागज के पन्नों पर प्यार भेजने का दौर लगभग समाप्त हो गया है। अब एक संदेश और दो-चार इमोजी भेजकर ही शुभकामनाओं की औपचारिकता पूरी हो जाती है। सामने से ‘शुभ विजयादशमी’ का जवाब आ जाए, तो लगता है कि जिम्मेदारी पूरी हो गई। लेकिन इस सहजता के बीच इंतजार का जादू और चिट्ठियों में छिपी प्यार की खुशबू खो गई है।
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि दुर्गापूजा समाप्त होने के बाद मन उदास हो जाता था। ढाक की आवाज थमने और त्योहार की रौनक खत्म होने के बीच एक नया इंतजार शुरू होता था—डाकिये का इंतजार। वह अपनी बहन के साथ बैठकर डाकिये की साइकिल की घंटी सुनने की प्रतीक्षा करती थीं। मन में उत्सुकता रहती थी कि कब डाकिया घर के सामने आएगा और अपने बैग से उनके नाम का कोई पत्र निकालेगा।
अपने नाम का लिफाफा देखकर मिलने वाली खुशी को आज की पीढ़ी के लिए समझ पाना मुश्किल है। परिचित व्यक्ति की लिखावट, कागज पर फैली स्याही और शब्दों के किनारे लिखी छोटी-छोटी बातें, हर पत्र को खास बना देती थीं। वह सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि दूर बैठे किसी अपने को महसूस करने का माध्यम होता था।
उन्होंने घर में जमा हुए अनेक पत्रों, लिफाफों और पोस्टकार्ड का भी जिक्र किया। किसी पत्र में पूजा की बातें होती थीं, तो किसी में रिश्तेदारों के घर आने का वादा। हर चिट्ठी में दूर बैठे लोगों का स्नेह और अपनापन समाया रहता था। उन पत्रों को बार-बार पढ़ना और अपनी बहन के साथ उनकी बातें साझा करना बचपन की अनमोल यादों का हिस्सा था।
अग्निमित्रा पाल की इस पोस्ट में बीते समय के प्रति एक गहरी भावुकता दिखाई देती है। पत्र भले ही अब पुराने हो गए हों, लेकिन उनसे जुड़ी यादें आज भी मन में जीवित हैं। उनकी लेखनी मानो उस बीते दौर में लौट जाना चाहती है, जब वह और उनकी बहन डाकिये की साइकिल की घंटी सुनने के लिए उत्सुकता से इंतजार किया करती थीं।
तकनीक ने संवाद को आसान जरूर बना दिया है, लेकिन हाथ से लिखे पत्रों में छिपा अपनापन और उनके इंतजार की खुशी आज भी अपनी अलग अहमियत रखती है।
