मिट्टी, पानी और जंगल से बदलाव की कहानी
जलवायु संकट के बीच झारखंड के गांवों ने चुनी नई राह
खूंटी, 15 अक्टूबर । झारखंड के गांवों में बदलाव की कहानी अब खेतों में लहलहाती फसलों, पानी से भरे तालाबों और जंगलों में लौटती हरियाली के बीच लिखी जा रही है। बदलते मौसम, अनियमित बारिश और लंबे सूखे के बीच ग्रामीण समुदाय प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर अपनी आजीविका सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं वर्षाजल को सहेजकर खेती को सहारा दिया जा रहा है, कहीं मिट्टी की सेहत सुधारने के साथ फसलों में विविधता लाई जा रही है, तो कहीं सौर ऊर्जा और सामुदायिक वन प्रबंधन के जरिए टिकाऊ विकास की नींव रखी जा रही है।
जलवायु परिवर्तन का असर झारखंड के ग्रामीण जीवन में साफ महसूस किया जा रहा है। बारिश के बदलते पैटर्न, मिट्टी में घटती नमी और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने छोटे किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं। खेती और जंगलों पर निर्भर परिवारों के लिए यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं, बल्कि भोजन, रोजगार और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। ऐसे में गुमला, खूंटी और लोहरदगा के कुछ गांवों में चल रहे प्रयास उम्मीद की नई तस्वीर पेश करते हैं।
गुफू में पानी बना भविष्य की पूंजी
खूंटी जिले के गुफू गांव में जल संरक्षण को खेती और आजीविका से जोड़ने की कोशिश की गई है। तालाब, डोभे और चेक डैम जैसी संरचनाओं के माध्यम से वर्षाजल को रोकने और जमीन में उसकी पैठ बढ़ाने पर जोर दिया गया है। भूमि उपचार और आम के बाग लगाने के प्रयास भी इस पहल का हिस्सा हैं। इन उपायों से मिट्टी के कटाव को कम करने, नमी बनाए रखने और सिंचाई की उपलब्धता बेहतर करने की संभावना बढ़ती है। ग्रामीणों के अनुसार, सिंचाई की सुविधा से साल में तीन फसलें लेने के अवसर बने हैं। इससे खेती को केवल मानसून पर निर्भर रखने की मजबूरी कम करने में मदद मिल सकती है। गुफू का अनुभव बताता है कि पानी को बहकर निकल जाने वाले संसाधन के बजाय भविष्य की पूंजी मानना जरूरी है। जल संरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब उसका जुड़ाव खेतों की उत्पादकता और किसानों की जरूरतों से हो।
रोचो में खेती की बदली सोच
लोहरदगा जिले के कुरु प्रखंड का रोचो गांव खेती में विविधता और मिट्टी की सेहत के महत्व को सामने रखता है। सब्जियों की खेती, बागवानी, पशुधन और जैविक पद्धतियों के माध्यम से कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। फसल अवशेषों और पशुओं से मिलने वाले जैविक पदार्थों का उपयोग मिट्टी की उर्वरता सुधारने में मदद कर सकता है। स्वस्थ मिट्टी पानी को बेहतर ढंग से सोखने और नमी बनाए रखने में सहायक होती है। वहीं, अलग-अलग फसलों और आजीविका के स्रोतों से किसी एक फसल पर निर्भरता कम करने के अवसर मिलते हैं। बदलते मौसम में खेती को मजबूत बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। मिट्टी, पानी, फसल और पशुधन के बीच संतुलन स्थापित करना भी उतना ही जरूरी है।
सेहल में सूरज से सिंचाई और आजीविका
गुमला जिले के घाघरा प्रखंड का सेहल गांव सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई की संभावनाओं को रेखांकित करता है। डीजल पंपों के मुकाबले सौर ऊर्जा सिंचाई के लिए वैकल्पिक साधन उपलब्ध करा सकती है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने में मदद कर सकती है। एक स्वयंसेवी संस्था के स्टेट हेड प्रेम शंकर के अनुसार, सेहल में सौर ऊर्जा से जुड़े प्रयासों के तहत लगभग 110 परिवार जुड़े हैं। उनके मुताबिक, इन प्रयासों से सालाना करीब 60,000 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन में कमी दर्ज किए जाने की रिपोर्ट है। इस आकलन के आधार और गणना-पद्धति की जानकारी से इसके पर्यावरणीय प्रभाव को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सौर पंपों की दीर्घकालिक उपयोगिता उपकरणों के रखरखाव, पानी की उपलब्धता और जिम्मेदार इस्तेमाल पर निर्भर करती है। ऊर्जा और सिंचाई का बेहतर तालमेल ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
पोरहा और कोचा में पहाड़ी से घाटी तक की सोच
पोरहा और कोचा से जुड़ा जल संरक्षण का दृष्टिकोण बताता है कि पानी को किसी एक खेत या तालाब तक सीमित रखकर नहीं देखा जा सकता। पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षाजल तेज गति से बहते हुए उपजाऊ मिट्टी को भी अपने साथ ले जा सकता है। रिज-टू-वैली यानी पहाड़ी से घाटी तक समेकित जलग्रहण प्रबंधन में ऊपरी ढलानों पर मिट्टी और पानी का संरक्षण, वनस्पतियों की सुरक्षा तथा निचले इलाकों में जल संरचनाओं का विकास एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इसका उद्देश्य पूरे जलग्रहण क्षेत्र को ध्यान में रखकर प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना है। यह सोच स्पष्ट करती है कि पानी, मिट्टी और वनस्पति का संरक्षण अलग-अलग प्रयासों से नहीं, बल्कि समन्वित योजना और सामुदायिक भागीदारी से अधिक प्रभावी हो सकता है।
जंगलों की सुरक्षा में समुदाय की भूमिका
झारखंड में जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका, जैव विविधता और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं। लोहड़ी, कुरडेगा और छोट चोरगई जैसे गांवों में सामुदायिक भागीदारी और प्राकृतिक पुनर्जनन से जुड़े प्रयास इसी महत्व को रेखांकित करते हैं।
गुमला जिले के बसिया प्रखंड की पोकता पंचायत स्थित लोहड़ी गांव में सामुदायिक वन संरक्षण की अवधारणा महत्वपूर्ण है। स्थानीय वनस्पतियों को बचाना, जंगलों पर अनावश्यक दबाव कम करना और प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधों को पनपने का अवसर देना वन संरक्षण के प्रभावी उपाय हो सकते हैं। इसी प्रखंड के कुरडेगा में वन अधिकार और संरक्षण की जिम्मेदारी के बीच संतुलन का सवाल अहम है। सामुदायिक अधिकारों को मान्यता मिलने के साथ जंगलों के टिकाऊ उपयोग, स्थानीय भागीदारी और भविष्य की जरूरतों पर ध्यान देना भी जरूरी है।
लोहरदगा जिले के किस्को प्रखंड का छोट चोरगई जंगलों को केवल पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी जैव विविधता और प्राकृतिक प्रक्रियाओं से समझने की जरूरत बताता है। स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण, प्राकृतिक पुनर्जनन और जंगलों को आग तथा अवैज्ञानिक दोहन से बचाना दीर्घकालिक बहाली के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
संस्थाओं के प्रयासों के दिख रहे सकारात्मक परिणाम
खूंटी, गुमला सहित अन्य इलाकों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए काम कर रही संस्थाओं की भूमिका पर खूंटी जिले के उप विकास आयुक्त प्रवीण कुमार प्रकाश ने कहा कि जेएसएलपीएस और प्रदान जैसी संस्थाओं के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इन संस्थाओं और स्थानीय समुदायों के प्रयासों का महत्व इस बात में है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को ग्रामीण आजीविका से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इन पहलों के वास्तविक और दीर्घकालिक प्रभाव को समझने के लिए पानी की उपलब्धता, मिट्टी की गुणवत्ता, खेती से होने वाली आय और जंगलों में प्राकृतिक पुनर्जनन जैसे संकेतकों का नियमित आकलन जरूरी है।
आठ गांव, एक साझा संदेश
गुफू, रोचो, सेहल, पोरहा, कोचा, लोहड़ी, कुरडेगा और छोट चोरगई के अनुभव अलग-अलग हैं, लेकिन इनका साझा संदेश है कि जलवायु संकट का सामना करने के लिए मिट्टी, पानी, खेती, ऊर्जा और जंगलों को एक-दूसरे से जोड़कर देखना होगा। हर गांव की भौगोलिक स्थिति और जरूरतें अलग हैं, इसलिए किसी एक मॉडल को हर जगह लागू करना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप योजनाएं, सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी सहयोग और नियमित निगरानी ही इन प्रयासों को टिकाऊ बना सकती है।
जानकारों का कहना है कि झारखंड के इन गांवों की कहानी केवल संसाधनों को बचाने की नहीं, बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश है। जब पानी जमीन में ठहरता है, मिट्टी अपनी उर्वरता बनाए रखती है, खेतों में विविधता बढ़ती है और जंगलों को प्राकृतिक रूप से पनपने का अवसर मिलता है, तब बदलाव का असर पर्यावरण से आगे बढ़कर ग्रामीण आजीविका और सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच सकता है।
जलवायु संकट के दौर में यही साझेदारी सबसे बड़ी उम्मीद है, प्रकृति का संरक्षण और समुदायों का सशक्तीकरण साथ-साथ आगे बढ़ें, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए झारखंड की मिट्टी, पानी और जंगल सुरक्षित रह सकें।
