दीपोत्सव पर सामाजिक संस्थाओं की अनूठी पहल
सामूहिक मिठाई निर्माण से 30 से 40% तक घटी लागत
कच्ची सामग्री की खरीद से लेकर चाशनी और पैकिंग तक वरिष्ठजन खुद संभाल रहे कमान
उदयपुर, 5 नवम्बर (कौशल मूंदड़ा)। त्योहारी उल्लास के बीच जब बाजार में मिठाइयों के दाम आसमान छू रहे हों और मावे-घी में मिलावट का डर परिवारों का बजट बिगाड़ रहा हो, तब झीलों की नगरी के सामाजिक संगठनों ने इसका एक सामूहिक व व्यावहारिक समाधान ढूंढ निकाला है। उदयपुर में माहेश्वरी समाज समिति, सहकार भारती और सहकारी उपभोक्ता थोक भंडार जैसी संस्थाओं की पहल पर अब ‘बल्क प्रोडक्शन’ (सामूहिक निर्माण) के जरिये न केवल बाजार भाव से बेहद सस्ती मिठाइयां तैयार की जा रही हैं, बल्कि शुद्धता की कसौटी पर भी यह मॉडल पूरी तरह खरा उतर रहा है। यह अनूठी मुहिम आमजन के रसोई बजट में मिठास घोल रही है।
15 दिन पहले जुटते हैं ऑर्डर, नो प्रॉफिट-नो लॉस पर काम
—त्योहारों से ठीक 10 से 15 दिन पहले समाज के युवा और कार्यकर्ता घर-घर व डिजिटल माध्यमों से मांग का आकलन कर ऑर्डर बुक करते हैं। इसके बाद भारी मात्रा में देसी घी, सूखे मेवे, बेसन और शक्कर की सीधी थोक खरीद की जाती है। बिचौलियों के मुनाफे और भारी-भरकम दुकान खर्च (ओवरहेड कॉस्ट) से मुक्ति मिलने के कारण लागत में भारी गिरावट आती है। मिठाई तैयार होने के बाद इसे नो प्रॉफिट-नो लॉस अथवा बेहद मामूली प्रशासनिक शुल्क जोड़कर वितरित किया जाता है। खास बात यह है कि इस सेवा में लगे सामाजिक कार्यकर्ता खुद कोई पारिश्रमिक नहीं लेते और हलवाइयों से भी पूरे भाव—ताव, गुणवत्ता, स्वाद आदि पर चर्चा के बाद पारिश्रमिक तय किया जाता है।
कारोबारियों ने स्टाफ गिफ्टिंग के लिए भी चुना यह विकल्प
—इस नवाचार की लोकप्रियता अब सिर्फ समाज विशेष तक सीमित नहीं रही। जिन समाजों में यह बल्क मिठाई बन रही है, उन समाजों के कई छोटे-बड़े उद्यमी और व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों व श्रमिकों को त्योहार पर बांटी जाने वाली मिठाइयों की बुकिंग भी इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से करवा रहे हैं। इसके अलावा, मित्र मंडली और परिचितों के मार्फत अन्य समाजों के लोग भी इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं।
कहते हैं समाजसेवी
—महेश सेवा संस्थान उदयपुर के अध्यक्ष राजेश राठी कहते हैं, हमारा उद्देश्य व्यापार नहीं, बल्कि हर घर तक त्योहार की असली मिठास पहुंचाना है। बाजार में बढ़ती महंगाई को देखते हुए समाज ने यह बीड़ा उठाया है। थोक में उत्तम सामग्री खरीदकर अनुभवी हलवाइयों से वरिष्ठ पदाधिकारियों की सीधी देखरेख में मिठाइयां बनवाई जाती हैं, जिससे शुद्धता पर कभी कोई समझौता नहीं होता।
—माहेश्वरी पंचायत शहर के सचिव गोपाल कृष्ण गदिया कहते हैं, सामूहिक शक्ति और पारदर्शी व्यवस्था से ही दरों में इतनी राहत संभव हुई है। हम नो प्रॉफिट-नो लॉस के सिद्धांत पर काम करते हैं। कार्यकर्ता अपने नियमित कामकाज से समय निकालकर पूरी व्यवस्था संभालते हैं। जितने अधिक ऑर्डर मिलते हैं, लागत उतनी ही घटती है और इसका सीधा लाभ परिवारों की जेब को मिलता है।
मिठाई लेने वालों ने यह कहा
—बुक की गई मिठाई लेने आए युवा उद्यमी अतुल माहेश्वरी ने कहा कि पहले त्योहारी सीजन में मिठाई खरीदने से पहले सौ बार सोचना पड़ता था कि मिलावटी तो नहीं होगी। यहां बाजार से 300-400 रुपये प्रति किलो सस्ती मिठाई मिल रही है और अपने ही लोगों की निगरानी में बनने के कारण शुद्धता पर पूरा भरोसा रहता है।
