उदयपुर, 31 अगस्त (कौशल मूंदड़ा)। राजनीतिक आयोजनों और प्रदर्शनों के चलते सोमवार को शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। कलेक्ट्रेट के बाहर मुख्य मार्गों पर बेरिकेडिंग कर रास्ते बंद किए जाने से आम नागरिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। शहर के प्रमुख चौराहों पर लगे लंबे जाम से एंबुलेंस और स्कूली वाहन तक फंसे रहे, जिससे जिला प्रशासन की ट्रैफिक प्लानिंग और व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सोमवार को विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों द्वारा कलेक्ट्रेट के बाहर प्रदर्शन व रैलियां निकाली गईं। इस दौरान शहर के मुख्य मार्गों पर भारी भीड़ और जुलूसों के कारण यातायात व्यवस्था बिगड़ गई। प्रशासन द्वारा सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के नाम पर कलेक्ट्रेट के आसपास के रास्तों को आवागमन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिससे वैकल्पिक मार्गों पर वाहनों का भारी दबाव बढ़ गया।
रास्ते बंद होने और डाइवर्जन की पुख्ता जानकारी न मिलने के कारण वाहन चालकों को शहर के भीतरी और बाहरी इलाकों में भीषण जाम से जूझना पड़ा। स्थिति यह थी कि शहर के मुख्य मार्ग रेंग-रेंग कर चलते नजर आए। दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, व्यापारियों और रोजमर्रा के कामकाज के लिए निकले आम नागरिकों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में सामान्य से दोगुना समय लगा।
इस व्यवस्था के बाद आम जनता में प्रशासन के खिलाफ गहरा आक्रोश देखने को मिला। नागरिकों और बुद्धिजीवियों का सवाल है कि क्या जनता की सुविधा और सुगम यातायात से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों और नेताओं की सहूलियत है? स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बार राजनीतिक आयोजनों के दौरान शहर की जनता को बलि का बकरा बनाया जाता है, जबकि प्रशासन पहले से कोई ठोस और वैकल्पिक ट्रैफिक प्लान तैयार करने में नाकाम साबित होता है।
यातायात विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए शहर से बाहर किसी निश्चित स्थल का चयन करे या तय समय के लिए ही मार्गों को बंद करे, तो आम जनता को इस तरह की भारी असुविधा से बचाया जा सकता है। फिलहाल, इस व्यवस्था ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है।
