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कोलकाता, 07 जुलाई । कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी आरोपित को पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से घुमाय जाना स्वीकार्य नहीं है और यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने यह टिप्पणी तृणमूल कांग्रेस नेता सौकत मोल्ला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता किशोर दत्ता ने अदालत को बताया कि गिरफ्तारी के बाद आरोपितों को सार्वजनिक रूप से घुमाने की एक चिंताजनक प्रवृत्ति विकसित हो गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी आरोपित को गिरफ्तार करने के बाद उसे विधि के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक प्रदर्शन का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

इस पर पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि ऐसी कार्रवाई स्वीकार्य नहीं है और यह मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि याचिका का प्रमुख आधार उनके मुवक्किल को कथित रूप से सार्वजनिक रूप से घुमाया जाना है। साथ ही इस कार्रवाई को चुनौती देने के अलावा कार्यवाही रद्द करने की भी मांग की गई है।

हालांकि, अदालत ने कार्यवाही रद्द करने की मांग पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब याचिकाकर्ता पहले से न्यायिक हिरासत में है, तब ऐसी राहत की आवश्यकता क्या है? अदालत ने पूछा कि यदि आरोपित पहले से हिरासत में है तो अब विवाद का मुख्य बिंदु क्या है और क्या वास्तव में उसे सार्वजनिक रूप से घुमाया गया था?

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि उनके मुवक्किल को वास्तव में सार्वजनिक रूप से घुमाया गया था।

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि आरोपित को केवल घटनास्थल की पहचान और घटनाक्रम के पुनर्निर्माण के लिए वहां ले जाया गया था। उन्होंने बताया कि मौके पर भीड़ अवश्य एकत्र हुई थी, लेकिन किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना नहीं होने दी गई। राज्य ने यह भी कहा कि आरोपित सामूहिक दुष्कर्म के गंभीर मामले में आरोपित है और प्रकरण की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी कर रही है।

इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि राज्य का कहना है कि यह कार्रवाई राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने की थी, तो उसे भी मामले में पक्षकार बनाया जाएगा। जवाब में राज्य ने कहा कि प्रारंभिक चरण में आरोपित की हिरासत राष्ट्रीय जांच एजेंसी के पास थी।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि उसके समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में संबंधित दंडात्मक धाराओं का उल्लेख नहीं किया गया है। इस पर पीठ ने कहा की रिपोर्ट में धाराओं का उल्लेख ही नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि जब मामले के तथ्य इतने गंभीर हैं, तब कार्यवाही निरस्त करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है।