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नई दिल्ली, 22 जनवरी । भारत में स्ट्रोक यानि मस्तिष्क का दौरा मौत और लंबे समय की विकलांगता की बड़ी वजहों में से एक है। स्ट्रोक के मामले में हर मिनट बहुत कीमती होता है। इलाज में देरी से दिमाग की करोड़ों कोशिकाएं नष्ट होने का जोखिम होता है। अगर समय पर यानी “गोल्डन आवर” में इलाज मिल जाए तो जान और जीवन की गुणवत्ता दोनों बचाई जा सकती है।

इसी समस्या को हल करने के लिए भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएमआर) ने असम सरकार को दो मोबाइल स्ट्रोक यूनिट (एमएसयू) सौंपी हैं। इससे दूरदराज और ग्रामीण इलाकों के मरीजों को अस्पताल पहुंचाए जाने के बजाय अस्पताल खुद मरीज के पास पहुंचेगा।

आईसीएमआर के महानिदेशक और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने गुरुवार को बताया कि मोबाइल स्ट्रोक यूनिट सबसे पहले जर्मनी में शुरू हुई थी। भारत दुनिया का दूसरा देश है, जिसने ग्रामीण और कठिन इलाकों में इसे इमरजेंसी सेवाओं से जोड़कर सफलतापूर्वक लागू किया है।

असम सरकार के स्वास्थ्य सचिव पी. अशोक बाबू ने कहा कि इस यूनिट के राज्य को सौंपे जाने से असम की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था और मजबूत होगी और यह जीवन रक्षक सेवा लगातार चलती रहेगी। इसके नतीजे बेहद सकारात्मक रहे हैं। इलाज का समय 24 घंटे से घटकर करीब 2 घंटे रह गया। मौतों में एक-तिहाई की कमी आई

और विकलांगता आठ गुना तक कम हुई। साल 2021 से अगस्त 2024 तक मोबाइल स्ट्रोक यूनिट को 2,300 से ज्यादा आपात कॉल मिलीं। इनमें से 90 प्रतिशत मरीजों को उनके घर से ही इलाज मिला।

यह पहल असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत में स्ट्रोक मरीजों के लिए नई उम्मीद बनकर आई है।

मोबाइल स्ट्रोक यूनिट

यह एक चलता-फिरता अस्पताल है, जिसमें सीटी स्कैन मशीन, विशेषज्ञ डॉक्टरों से वीडियो कॉल द्वारा सलाह, जरूरी जांच सुविधा, स्ट्रोक का थक्का घोलने वाली दवाएं

मौजूद होती हैं। इससे मरीज के घर के पास ही स्ट्रोक की पहचान और इलाज शुरू हो जाता है, जो जान और अपंगता दोनों से बचाता है।

पूर्वोत्तर भारत में स्ट्रोक के मरीज ज्यादा हैं लेकिन पहाड़ी इलाके और लंबी दूरी के कारण समय पर इलाज मुश्किल होता है। आईसीएमआर ने इसी वजह से असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ और तेजपुर के अस्पतालों में स्ट्रोक यूनिट बनाई और मोबाइल स्ट्रोक यूनिट को एम्बुलेंस सेवा 108 से जोड़ा।