राजस्थानी मोट्यार परिषद का शनिवार सुबह 10 बजे बीकानेर कलेक्ट्रेट परिसम में होगा धरना
बीकानेर, 20 फरवरी। विश्व स्तर पर मनाए जा रहे International Mother Language Day के अवसर पर जहां पूरा विश्व अपनी-अपनी मातृभाषाओं के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प ले रहा है, वहीं राजस्थान में राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता और राजभाषा का दर्जा नहीं मिलने के विरोध में राजस्थानी मोट्यार परिषद, बीकानेर द्वारा कलेक्ट्रेट परिसर में 21 फरवरी शनिवार सुबह 10 बजे से धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
परिषद के पदाधिकारियों का कहना है कि वर्षों से राजस्थानी भाषा की लगातार उपेक्षा की जाती रही है। उनका आरोप है कि राजनीतिक दल चुनाव के समय जनता से राजस्थानी में संवाद कर वोट तो मांगते हैं, परंतु संसद और विधानसभा में राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए कोई ठोस और प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2003 में राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, किंतु आज तक उस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। परिषद का कहना है कि यह विषय लंबे समय से लंबित है और राज्य तथा केंद्र स्तर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण इसे न्याय नहीं मिल पा रहा है।
परिषद ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 के अंतर्गत राज्य सरकार स्वयं भी राजस्थानी को राज्य की राजभाषा घोषित कर सकती है। इसके बावजूद अनेक बार बहस और निजी विधेयक (प्राइवेट बिल) प्रस्तुत होने के बाद भी अब तक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
नई शिक्षा नीति 2020 में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने का स्पष्ट प्रावधान है, परंतु राजस्थान के बच्चों को आज भी अपनी वास्तविक मातृभाषा राजस्थानी में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। परिषद का यह भी आरोप है कि निजी विद्यालयों में बच्चों को यह सिखाया जा रहा है कि उनकी मातृभाषा हिंदी है, जबकि प्रदेश के बड़े भूभाग में राजस्थानी विभिन्न बोलियों के रूप में जनजीवन की भाषा है और लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य तथा इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है।
राजस्थानी मोट्यार परिषद पिछले 27 वर्षों से राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए सतत संघर्ष कर रही है। परिषद के प्रमुख कार्यकर्ताओं डॉ. गौरी शंकर प्रजापत, डॉ. नमामि शंकर आचार्य, डॉ. हरिराम विश्नोई, राजेश चौधरी, हिमांशु टाक, प्रशांत जैन, कमल मारू, दिलीप सेन, बजरंग बिश्नोई, मदनदान, सुनील विश्नोई, विनोद माली सहित कई सदस्य पिछले 15 दिनों से धरने को सफल बनाने के लिए व्यापक जनसंपर्क और संगठनात्मक प्रयास कर रहे हैं।
परिषद के अनुसार इस धरना-प्रदर्शन में राजस्थानी साहित्यकार, संत-महात्मा, विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े जनप्रतिनिधि, पार्षद, रंगकर्मी, राजस्थानी हास्य कलाकार, सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारी, कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों के छात्र नेता, राजस्थानी भाषा के विद्यार्थी तथा हजारों की संख्या में राजस्थानी भाषा के समर्थक और आमजन भाग लेंगे।
परिषद का स्पष्ट संदेश है कि राजस्थानी केवल एक बोली नहीं, बल्कि समृद्ध साहित्य, लोकसंस्कृति और गौरवशाली इतिहास से परिपूर्ण भाषा है, जिसे उसका उचित सम्मान और संवैधानिक दर्जा मिलना चाहिए। विश्व मातृ भाषा दिवस के अवसर पर आयोजित यह धरना सरकार को यह याद दिलाने का प्रयास है कि मातृभाषा का सम्मान केवल उत्सव मनाने से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत निर्णयों और संवैधानिक मान्यता से सुनिश्चित होता है।
