हजारीबाग रामनवमी

हजारीबाग, 27 मार्च । झारखंड के हजारीबाग की ऐतिहासिक रामनवमी आज केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अद्वितीय संगम बन चुकी है, जिसकी गूंज देश की संसद से लेकर विदेशों तक सुनाई देती है। लगभग 107 वर्षों पुरानी यह परंपरा वर्ष 1918 में प्रारंभ हुई थी, जो समय के साथ विश्वस्तरीय पहचान प्राप्त कर चुकी है।

इस गौरवशाली परंपरा की नींव गुरु सहाय ठाकुर, हीरालाल महाजन और टीभर गोप जैसे समाजसेवियों ने महावीरी पताका के साथ रखी थी। प्रारंभ में कुछ लोगों के छोटे से जुलूस के रूप में शुरू हुआ यह आयोजन आज एक विशाल सांस्कृतिक महाकुंभ का रूप ले चुका है।

हजारीबाग की रामनवमी अपनी भव्यता, अनुशासन और अनूठी परंपराओं के लिए जानी जाती है। देश के अन्य हिस्सों से अलग, यहां मुख्य जुलूस नवमी के बजाय दशमी को निकाला जाता है, जो एकादशी तक निरंतर चलता है। लगभग 10 किलोमीटर लंबे निर्धारित मार्ग—झंडा चौक, बड़ा अखाड़ा, महावीर स्थान, ग्वाल टोली होते हुए जामा मस्जिद रोड—पर निकलने वाला यह जुलूस पूरे शहर को भक्तिमय वातावरण में डुबो देता है।

करीब 48 घंटे तक चलने वाले इस आयोजन में 4 से 5 लाख श्रद्धालु शामिल होते हैं। वर्तमान में इसमें 150 से अधिक अखाड़े भाग लेते हैं, जिनमें से लगभग 100 हजारीबाग शहर के ही हैं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवा लाठी-डंडों और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र के साथ शक्ति प्रदर्शन और आकर्षक कलाबाजियां प्रस्तुत करते हैं, जो इस आयोजन की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।

1960 में महासमिति के गठन ने इस आयोजन को संगठित और व्यापक स्वरूप दिया, जबकि 1970 में पहली बार ताशा पार्टी के शामिल होने से इसकी भव्यता और बढ़ गई। इसके बाद पश्चिम बंगाल से ताशा वादकों की भागीदारी भी परंपरा का हिस्सा बन गई।

हजारीबाग की रामनवमी की विशेषता इसकी भव्य झांकियों में भी झलकती है, जहां रामेश्वरम, रामसेतु और अयोध्या धाम जैसे पौराणिक स्थलों का जीवंत चित्रण किया जाता है। यही कारण है कि जब देश के अन्य हिस्सों में रामनवमी समाप्त हो जाती है, तब हजारीबाग में “इंटरनेशनल रामनवमी” अपने चरम पर होती है।

वर्ष 2026 की रामनवमी विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के बाद यह पहला प्रमुख पर्व है, जो अभूतपूर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।

इतिहास में कई बार विषम परिस्थितियों—जैसे 1973, 1989 और 2016—के बावजूद हजारीबाग ने सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की मिसाल कायम की है। यह आयोजन सामाजिक एकता का भी प्रतीक है, जहां सभी समुदाय मिलकर इसकी गरिमा बनाए रखते हैं।

यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इससे स्थानीय मूर्तिकारों, कारीगरों और छोटे व्यापारियों को व्यापक रोजगार मिलता है, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि हजारीबाग की इस ऐतिहासिक रामनवमी को UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कर इसे वैश्विक स्तर पर और अधिक पहचान दिलाई जाए।

नागरिकों से अपील की गई है कि वे भगवान श्रीराम के आदर्शों का पालन करते हुए शांति, सौहार्द और अनुशासन के साथ इस गौरवशाली परंपरा का हिस्सा बनें, ताकि हजारीबाग की यह ऐतिहासिक रामनवमी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहे।