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रतलाम, 06 नवंबर। मध्य प्रदेश के रतलाम में दीपावली पर श्री महालक्ष्मी मंदिर धन-संपदा की अनूठी सजावट से जगमगा उठा है। मंदिर को करीब दो करोड़ रुपये के नोटों, 40 देशों की विदेशी मुद्रा और सोने-चांदी के आभूषणों से सजाया गया है। नोटों से तैयार वंदनवार, गमले, पेड़ और आकर्षक कलाकृतियां मंदिर की भव्यता बढ़ा रही हैं। गर्भगृह में चांदी के 57 हाथियों की मौजूदगी भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

मंदिर के पुजारी अश्विनी पुजारी ने बताया कि शुक्रवार को धनतेरस पर तड़के शुभ मुहूर्त में मां लक्ष्मी की पूजा गई और इसके बाद मंदिर को भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया गया। मंदिर में दर्शन के लिए सुबह से श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को कुबेर पोटली का वितरण भी शुरू हो गया है, जो भाईदूज तक जारी रहेगा। लाल कपड़े में दी जाने वाली इस पोटली में कमलगट्टा, कौड़ी, चावल, सुपारी, पिस्ता और गोमती चक्र रखे जाते हैं। मान्यता है कि इन सामग्रियों को मां लक्ष्मी को अर्पित करने से व्यापार में उन्नति और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

पुजारी असीम और दीपक व्यास ने बताया कि मंदिर की सजावट के लिए नोट एकत्र करने का काम शरद पूर्णिमा से शुरू हो जाता है। इस बार करीब दो हजार श्रद्धालुओं ने नकदी जमा कराई है। एक रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोटों से मंदिर की दीवारों और छत को सजाया गया है। नोटों की लड़ियों से वंदनवार और गमले बनाए गए हैं। इस बार नोटों से तैयार पेड़ भी सजावट का हिस्सा है। 100 और 200 रुपये के नोटों से मोरपंख की आकृतियां बनाई गई हैं।

उन्होंने बताया कि विदेशी भक्तों की ओर से दी गई करेंसी और डॉलर को भी सजावट में जगह मिली है। इन्हें लेमिनेशन कर सुरक्षित तरीके से प्रदर्शित किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में ढाई-ढाई किलो वजन के चांदी के पांच हाथियों के साथ चांदी के 52 छोटे हाथी रखे गए हैं। पहली बार 45 चांदी के सिक्कों से सजी साड़ी भी विशेष आकर्षण बनी है।

35 लोगों की टीम ने तैयार किया सजावट का स्वरूप

मंदिर को इस रूप में सजाने के लिए शरद पूर्णिमा से करीब 35 लोगों की टीम जुटी हुई है। यह टीम हर साल नोटों की लड़ियों और सजावट की नई कलाकृतियां तैयार करती है। कलाकार कपिल श्रोत्रिय पिछले तीन वर्षों से इस काम में सेवा दे रहे हैं।

कपिल ने बताया कि नोटों को सुरक्षित रखने के लिए सजावट में पिन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। प्रत्येक नोट को अलग पॉलिथीन में रखकर बारीकी से सजाया जाता है। इससे नोटों को मोड़ने या पिरोने के दौरान नुकसान नहीं पहुंचता। पांच दिन बाद पॉलिथीन से नोट निकालकर संबंधित भक्तों को लौटा दिए जाते हैं। कई श्रद्धालु पिछले साल जमा कराए गए नोटों को ही दोबारा सजावट के लिए दे देते हैं।

एक अन्य कलाकार ऐश्वर्य सोमानी ने बताया कि नोटों की लड़ियां तैयार करने में काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। नोट में सुई की नोक जितना छोटा छेद कर बारीक धागे से उन्हें पिरोया जाता है। जरा-सा अधिक दबाव पड़ने पर नोट फट सकता है। लंबे समय से मंदिर से जुड़े कलाकारों ने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों से यह कला सीखी है। कुछ श्रद्धालु सजावट में इस्तेमाल नोट घर ले जाकर पूजा में रखते हैं, जबकि कुछ उन्हें फिर से बाजार में चलन के लिए इस्तेमाल करते हैं।

हर जमा राशि और जेवर का रखा जाता है हिसाब

पंडित अश्विनी पुजारी के अनुसार, मंदिर में नकदी और आभूषण जमा कराने वाले प्रत्येक भक्त का पूरा विवरण दर्ज किया जाता है। इसके लिए रजिस्टर में नाम, पता, फोटो, मोबाइल नंबर और जमा की गई रकम या जेवरों की जानकारी लिखी जाती है। इस बार ऑनलाइन पंजीयन की सुविधा भी शुरू की गई है। कई श्रद्धालुओं ने घर बैठे पंजीयन कराया और बाद में मंदिर पहुंचकर अपनी राशि जमा की। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से पंजीयन कराने वालों को सील लगा टोकन दिया जाता है। इसी के आधार पर पांच दिन बाद उनकी जमा सामग्री लौटाई जाती है।

मंदिर में नकदी और आभूषणों की सुरक्षा के लिए प्रशासन की निगरानी में व्यवस्था की गई है। प्रतिदिन जमा होने वाली सामग्री का हिसाब रखा जाता है। बंदूकधारी सुरक्षा गार्ड तैनात हैं और गर्भगृह से लेकर पूरे परिसर तक 24 से अधिक सीसीटीवी कैमरों से निगरानी की जाती है।

आठ स्वरूपों में विराजमान हैं मां महालक्ष्मी

मंदिर के गर्भगृह में मां महालक्ष्मी के साथ भगवान गणेश और माता सरस्वती की प्रतिमाएं स्थापित हैं। महालक्ष्मी की प्रतिमा के हाथ में धन की थैली है, जिसे वैभव और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यहां मां लक्ष्मी के आठ स्वरूपों के दर्शन होते हैं। इनमें आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, लक्ष्मीनारायण, धन लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी शामिल हैं। दीपावली पर इन स्वरूपों के दर्शन और अनूठी सजावट को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।

गौरतलब है कि रतलाम के माणकचौक क्षेत्र में स्थित प्राचीन श्री महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर रुपयों और जेवरों से सजावट की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस मंदिर को धनतेरस से भाईदूज तक पांच दिनों के लिए विशेष स्वरूप में सजाया जाता है। इसकी खासियत यह है कि सजावट में इस्तेमाल होने वाली नकदी और आभूषण भक्त स्वयं जमा कराते हैं। पांच दिन बाद पूरी सामग्री संबंधित श्रद्धालुओं को सुरक्षित वापस कर दी जाती है। मान्यता है कि मां लक्ष्मी के दरबार में धन और आभूषण अर्पित करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।