चतरा-लातेहार की सीमा पर सलगी की मनोरम वादियों में स्थित है प्राचीन धार्मिक स्थल, दूर-दराज से पहुंचते हैं श्रद्धालु
चतरा, 22 अक्टूबर । झारखंड के चतरा और लातेहार जिले के सीमांत इलाके में सलगी गांव की मनोरम प्राकृतिक वादियों के बीच स्थित चटनियां बाबा का प्राचीन स्थल अपनी अनूठी परंपराओं और लोक आस्था के लिए विशेष पहचान रखता है। घने जंगलों, चारों ओर फैली हरियाली और शांत वातावरण के बीच स्थित यह धार्मिक स्थल वर्षों से श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां हर दिन दूर-दराज से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं लेकिन इस स्थल की सबसे खास परंपरा यह है कि रविवार को यहां पूजा-अर्चना पूरी तरह बंद रहती है।
जबड़ा मोड़ से पहुंचना है आसान
चटनियां बाबा का यह प्राचीन स्थल राष्ट्रीय राजमार्ग-99 (रांची–चतरा–डोभी मार्ग) पर स्थित जबड़ा मोड़ से सलगी गांव जाने वाले रास्ते पर अवस्थित है। सड़क मार्ग से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
गांव-समाज और पशुधन के रक्षक माने जाते हैं बाबा
स्थानीय लोगों के अनुसार, चटनियां गोसाईं सदियों से क्षेत्र के गांवों, पशुओं, घर-परिवार और समाज को आपदा-विपदा से बचाते आ रहे हैं। इसी लोकविश्वास के कारण चतरा के अलावा हजारीबाग, लातेहार, गुमला, कोडरमा, गया, पलामू और आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां माथा टेकने पहुंचते हैं। मुखिया संघ के अध्यक्ष अरविंद सिंह, सलगी निवासी सुभाष सिंह, आलोक रंजन सहित अन्य ने बताया कि मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत चटनियां बाबा के दरबार में पूरी होती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपनी परंपरा और आस्था के अनुसार, बकरे व मुर्गे की बलि चढ़ाते हैं। वहीं वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले श्रद्धालु जनेऊ और चावल अर्पित करते हैं।
मिट्टी के हाथी-घोड़े चढ़ाने की अनूठी परंपरा
चटनियां बाबा के दरबार में मन्नत पूरी होने पर मिट्टी से बने हाथी और घोड़े चढ़ाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मंदिर परिसर में रखे सैकड़ों मिट्टी के घोड़े और हाथी श्रद्धालुओं की आस्था तथा लोकविश्वास के प्रतीक हैं। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है और इस स्थल को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।
पाहन कराते हैं पूजा, रविवार को रहता है निषेध
इस धार्मिक स्थल की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यहां आज भी जनजातीय परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना कराई जाती है। गांव के पाहन यानी पारंपरिक पुजारी ही पूजा-विधि संपन्न कराते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रविवार का दिन चटनियां बाबा की पूजा के लिए निषिद्ध है। इस दिन यहां पूजा-अर्चना नहीं होती। श्रद्धालुओं को भी अन्य दिनों में दर्शन और पूजा के लिए आने तथा स्थानीय धार्मिक परंपराओं का सम्मान करने की सलाह दी जाती है।
आस्था, संस्कृति और प्रकृति का संगम
आधुनिक दौर में भी चटनियां बाबा का यह प्राचीन स्थल अपनी पारंपरिक पूजा-पद्धति और लोक मान्यताओं को संजोए हुए है। यहां का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक सुकून प्रदान करता है। चटनियां बाबा का दरबार न केवल लोक आस्था का केंद्र है बल्कि जनजातीय संस्कृति और झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरी सलगी की इन वादियों में यह स्थल धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं को भी उजागर करता है।
