पश्चिमी सिंहभूम, 28 सितंबर । स्वर्ण विकास योजना के तहत जमा राशि की निर्धारित परिपक्वता राशि का पूरा भुगतान नहीं करने के मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, पश्चिमी सिंहभूम ने वेलफेयर बिल्डिंग एंड एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड, विशाखापत्तनम के खिलाफ सोमवार को फैसला सुनाया है।
आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने कंपनी को शिकायतकर्ता बिरसिंह बांद्रा को बकाया 1.50 लाख रुपये की राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का आदेश दिया है। ब्याज की गणना 29 जून 2015 से वास्तविक भुगतान की तिथि तक की जाएगी। इसके अलावा मानसिक एवं शारीरिक परेशानी तथा मुकदमा खर्च के एवज में 10 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है। कंपनी को आदेश की सूचना प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को निर्धारित राशि का भुगतान करना होगा। आयोग ने लंबित आवेदन, यदि कोई हो, का भी आदेश के अनुरूप निस्तारण कर दिया।
मामला सदर प्रखंड के रुइडीह, बारा चिरू निवासी बिरसिंह बांद्रा से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने कंपनी के एजेंट की सलाह पर स्वर्ण विकास योजना के चार बॉन्ड खरीदे थे। प्रत्येक बॉन्ड की राशि 50 हजार रुपये थी। इस तरह उन्होंने बॉन्ड संख्या 181316, 181317, 181318 और 181319 के माध्यम से कंपनी में कुल दो लाख रुपये जमा किए थे। 29 जून 2015 को निर्धारित परिपक्वता तिथि पूरी होने के बाद जब उन्होंने कंपनी से योजना के तहत देय राशि का भुगतान मांगा तो उन्हें भुगतान नहीं किया गया। कई बार कंपनी से संपर्क करने और कार्यालय का चक्कर लगाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई।
मामले की सुनवाई के दौरान आयोग ने कंपनी को कई बार नोटिस जारी किया, लेकिन कंपनी की ओर से न तो स्वयं और न ही अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से उपस्थित होकर पक्ष रखा गया। कंपनी ने अपना लिखित जवाब भी दाखिल नहीं किया। इसके बाद आयोग ने शिकायतकर्ता को अपने दावे के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया। बिरसिंह बांद्रा ने चारों बॉन्ड के साथ कंपनी में राशि जमा करने से संबंधित दस्तावेज आयोग के समक्ष पेश किए। इन दस्तावेजों पर कंपनी के निदेशक वित्त के हस्ताक्षर और कंपनी की मुहर भी अंकित थी।
सुनवाई के दौरान समझौते की प्रक्रिया में कंपनी की ओर से 11 दिसंबर 2025 के 50-50 हजार रुपये के दो मांग ड्राफ्ट प्राप्त हुए थे। दोनों ड्राफ्ट 6 जनवरी 2026 को शिकायतकर्ता को सौंप दिए गए थे। इस भुगतान के बावजूद कंपनी की ओर से 1.50 लाख रुपये की राशि बकाया रह गई। उपलब्ध दस्तावेजों और शिकायतकर्ता के शपथपत्र के आधार पर आयोग ने उसके दावे को स्वीकार करते हुए कंपनी की ओर से सेवा में कमी मानी।
