
कोलकाता, 21 अगस्त । “सिटी ऑफ़ जॉय” के नाम से मशहूर कोलकाता महानगर लगातार हो रहे अग्निकांडों की वजह से “सिटी ऑफ़ भय” में तब्दील होता दिख रहा है। इसी हफ्ते महानगर के एक होटल में लगी आग में नौ लोगों की मौत की घटना के बाद एक बार फिर महानगर में आगलगी से होने वाली वीभत्स मौतों की यादें फिर से सिहरन पैदा करने लगी हैं।
कोलकाता में अग्निकांडों की कहानी सिर्फ लपटों और धुएं की नहीं है। यह हर बार सामने आने वाली उन कमियों की कहानी भी है, जिन पर हादसे के बाद तो सवाल उठते हैं, लेकिन कुछ समय बीतते ही सब कुछ सामान्य हो जाता है। पिछले दो दशकों में शहर ने कारखानों से लेकर अस्पतालों, बाजारों, रेलवे भवनों और होटलों तक कई भयावह अग्निकांड देखे हैं। इन घटनाओं में दो सौ से अधिक लोगों की जान जा चुकी है।
हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय होता है। जांच समितियां गठित होती हैं, सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा होती है, दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई का भरोसा दिलाया जाता है। लेकिन समय बीतने के साथ वही सवाल फिर सामने खड़े हो जाते हैं – आपातकालीन निकास की व्यवस्था कैसी थी? अग्निशमन उपकरण काम कर रहे थे या नहीं? इमारत में मौजूद लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की व्यवस्था क्यों नहीं थी?
सत्ता के स्तर पर भी इस दौरान बदलाव कम नहीं हुए। वाम मोर्चे के लंबे शासन के बाद तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई और अब राज्य में भाजपा की सरकार है। राजनीतिक चेहरे बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन बड़े अग्निकांडों के बाद सामने आने वाली तस्वीर में बहुत बदलाव नहीं आया।


















