rajasthani poster 01

राजस्थानी के संरक्षण—संवर्धन की आवश्यकता के सुर मुखर

प्रबुद्धजन बोले, राजस्थानी को मिले संवैधानिक मान्यता और विश्वविद्यालयों में स्थान

—कौशल मूंदड़ा—

उदयपुर, 17 जुलाई। राजस्थान में विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा के अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाने की तैयारियों के बीच राजस्थानी भाषा के संवर्धन, संरक्षण और संवैधानिक मान्यता की मांग एक बार फिर मुखर हो गई है। राजस्थानी प्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष, समाजसेवी एवं उद्योगपति प्रहलाद राय गोयनका, राजस्थानी मोट्यार परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शिवदान सिंह जोलावास, परिषद् के प्रदेश संयोजक मनोज कुमार स्वामी सहित कई प्रबुद्धजनों ने कहा है कि अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान आवश्यक है, लेकिन राजस्थान की अपनी मातृभाषा राजस्थानी की लगातार हो रही उपेक्षा गंभीर चिंता का विषय है।

राजस्थानी प्रचारिणी सभा के उपाध्यक्ष, समाजसेवी एवं उद्योगपति प्रहलाद राय गोयनका ने कहा कि राजस्थानी भारत की प्राचीन, समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा है। देश ही नहीं, दुनिया के कई देशों में बसे प्रवासी राजस्थानी आज भी इसे बोलते और राजस्‍थानी भाषा के माध्‍यम से अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद राजस्थानी को अब तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते राजस्थानी को उसका अधिकार नहीं मिला तो केवल भाषा ही नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत भी संकट में पड़ जाएगी। उन्होंने कहा कि राजस्थान में मराठी अध्ययन केंद्र स्थापित करने से पहले राजस्थानी भाषा के संरक्षण और संवर्धन को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

राजस्थानी मोट्यार परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. शिवदान सिंह जोलावास ने कहा कि राजस्थानी केवल एक बोली नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की समृद्ध साहित्यिक परंपरा वाली स्वतंत्र भाषा है। डिंगल और पिंगल साहित्य, चारण एवं भाट परंपरा, लोकदेवताओं की गाथाएं तथा ‘ढोला-मारू’, ‘वीर सतसई’, ‘वेलि कृष्ण रुक्मणी री’ जैसी अमूल्य कृतियां इसकी समृद्ध विरासत की साक्षी हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दे चुकी है और प्रतिवर्ष इस भाषा में साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी प्रदान किए जाते हैं, लेकिन संवैधानिक मान्यता का प्रश्न अब भी अधूरा है।

डॉ. जोलावास ने स्मरण कराया कि 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, लेकिन दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस पर निर्णय नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति मातृभाषा में शिक्षा पर बल देती है, फिर भी राजस्थान के अधिकांश विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के स्वतंत्र विभाग तक नहीं हैं और विद्यालयों में भी इसे अपेक्षित स्थान नहीं मिला है।

राजस्थानी मोट्यार परिषद् के प्रदेश संयोजक मनोज कुमार स्वामी ने कहा कि किसी भी राज्य की पहचान उसकी भाषा, साहित्य और संस्कृति से होती है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र अपनी भाषा के लिए सजग है, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल अपनी भाषाओं के संरक्षण के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं, ऐसे में राजस्थान को भी अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिए एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने मांग की कि प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के स्वतंत्र विभाग एवं अध्ययन केंद्र स्थापित किए जाएं, विद्यालय स्तर पर राजस्थानी को नियमित विषय बनाया जाए तथा राज्य सरकार और प्रदेश के सभी सांसद संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को शामिल कराने के लिए केंद्र सरकार पर प्रभावी पहल करें।

तीनों वक्ताओं का कहना है कि यह किसी दूसरी भाषा का विरोध नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता, मातृभाषा के सम्मान और आने वाली पीढ़ियों तक अपनी भाषा एवं विरासत को सुरक्षित पहुंचाने का प्रश्न है। उन्होंने प्रदेशवासियों से भी राजस्थानी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने का आह्वान किया।