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भुवनेश्वर, 15 जुलाई। विश्वप्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ रथयात्रा से एक दिन पूर्व बुधवार को पुरी श्रीमंदिर में अंतिम चरण के पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। मंगलवार को नवयौवन दर्शन के बाद ‘उभा यात्रा’ की महत्वपूर्ण नीति के तहत तीनों रथों को रथखला से श्रीमंदिर के सिंहद्वार तक लाया गया।

मंदिर परंपरा के अनुसार, प्रातःकाल महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र, देवी सुभद्रा और श्रीसुदर्शन की नियमित नीतियां संपन्न होंगी। इसके बाद गोपाल बल्लभ एवं सकाल धूप की नीतियों का संपादन किया गया ।

इसके उपरांत सेवायत पारंपरिक शोभायात्रा के माध्यम से महाप्रभु की ओर से ‘आज्ञामाला’ (दैवीय अनुमति की माला) तीनों रथों तक लेकर आये। इस अनुष्ठान को आज्ञामाला बीजे कहा जाता है और इसे रथयात्रा के शुभारंभ की औपचारिक अनुमति माना जाता है।

आज्ञामाला बीजे के बाद तीनों रथों को रथ खला (जहां रथ तैयार हो रहा था) से खींचकर श्रीजगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार के समक्ष लाया गया ।

मंदिर की परंपरा के अनुसार, सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ को, उसके बाद देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ को तथा अंत में भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ को सिंहद्वार तक लाया गया ।

रात्रि में भी कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक नीतियां संपन्न की जाएंगी। इन पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ ही गुरुवार को आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए सभी धार्मिक तैयारियां पूर्ण हो जाएंगी।

गुरुवार को महाप्रभु श्रीजगन्नाथ, महाप्रभु बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य पाहंडी बीजे के माध्यम से श्रीमंदिर से बाहर आकर अपने-अपने रथों पर विराजमान होंगे और लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में गुंडिचा मंदिर की वार्षिक यात्रा पर प्रस्थान करेंगे।