
नई दिल्ली, 27 मई। सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को वैध और संवैधानिक करार देते हुए कहा है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए नागरिकता की जांच कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को अंतिम रूप से गैर-नागरिक घोषित करने का अधिकार आयोग के पास नहीं होगा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने बुधवार को दिए अपने फैसले में कहा कि SIR प्रक्रिया मनमानी नहीं है और इसका उद्देश्य निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए कि संदिग्ध नागरिकता के आधार पर जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार की संबंधित एजेंसियों को भेजा जाए। संबंधित एजेंसियां प्रभावित लोगों को नोटिस देकर उनकी बात सुनेंगी और चुनाव से पहले निर्णय लेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पांच प्रमुख सवालों पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है और यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन नहीं करता। आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज, जिनमें आधार कार्ड सहित 11 प्रकार के प्रमाण शामिल हैं, उन्हें भी न्यायालय ने उचित माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
जून 2025 में बिहार से शुरू हुई SIR प्रक्रिया अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी हो चुकी है। इस दौरान कुल 7.41 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिनमें सबसे अधिक 2.89 करोड़ नाम उत्तर प्रदेश से कटे हैं। दूसरे चरण में मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, गोवा सहित अन्य राज्यों में भी यह प्रक्रिया लागू की गई। तीसरे चरण में 16 राज्यों और 3 केंद्रशासित प्रदेशों को शामिल किया जाएगा।
विपक्षी दलों ने फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि SIR के जरिए लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। कांग्रेस नेता अभिषेक मनुसिंघवी ने कहा कि पहले लोगों के नाम हटाए जाते हैं और बाद में अपील की प्रक्रिया होती है, तब तक चुनाव संपन्न हो जाते हैं। वहीं भाजपा ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि SIR स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक प्रक्रिया है तथा इससे विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम की पोल खुल गई है।


















