कोलकाता, 5 अप्रैल  । पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी. वी. आनंद बोस ने राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (वीसी) की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों की गलत व्याख्या किए जाने पर गहरी नाराज़गी जताई है। राजभवन की ओर से  जारी एक बयान में उन मीडिया रिपोर्टों का खंडन किया गया, जिनमें कहा गया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल (जो विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं) को वीसी नियुक्तियों के मामले में फटकार लगाई है।

राजभवन ने अपने बयान में कहा, “यह देखा गया है कि मीडिया के एक वर्ग में दो अप्रैल 2025 को विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 17403/2023 — ‘पश्चिम बंगाल राज्य बनाम डॉ. सनत कुमार घोष एवं अन्य’ — से संबंधित कार्यवाही की दुर्भाग्यपूर्ण रिपोर्टिंग और गलत व्याख्या की गई है।”

राजभवन ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल को 17 राज्य संचालित विश्वविद्यालयों में दो सप्ताह के भीतर पूर्णकालिक कुलपति नियुक्त करने का कोई आदेश नहीं दिया और न ही ऐसा कोई संकेत दिया कि नियुक्ति न होने पर अदालत हस्तक्षेप करेगी।

बयान में कहा गया, “यह पूरी तरह से असत्य है और जानबूझकर भ्रामक उद्देश्य से फैलाया गया एक कथानक प्रतीत होता है। राजभवन आमतौर पर अदालत की कार्यवाहियों या इन-कैमरा टिप्पणियों पर कोई टिप्पणी नहीं करता, लेकिन इस तरह की अपुष्ट रिपोर्टिंग ने हमें स्थिति स्पष्ट करने के लिए मजबूर किया है।”

राज्यपाल कार्यालय ने यह भी बताया कि अब तक 19 विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्त किए जा चुके हैं। शेष 17 विश्वविद्यालयों के मामलों में राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों पर “उचित आपत्तियां” दर्ज करवाई थीं, जो सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपने के लिए तैयार की गई थीं।

बयान के अनुसार, ये आपत्तियां उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि, आचरण और संबंधित क्षेत्रों के विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर उठाई गई थीं।

राजभवन ने बताया कि चूंकि मामला विशेष सूची में आ जाने के कारण सीलबंद लिफाफे में राज्यपाल की आपत्तियां अदालत में प्रस्तुत नहीं की जा सकीं।

बयान में आगे कहा गया, “इन प्रस्तुतियों के अभाव में, अदालत ने केवल यह आशा व्यक्त की कि राज्यपाल लंबित नियुक्तियों को दो सप्ताह में निपटा पाएंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो अदालत अगली सुनवाई में इस पर विचार करेगी।”

राजभवन ने दोहराया कि अदालत की कार्यवाहियों में कहीं भी राज्यपाल के अधिकारों को सीमित नहीं किया गया है और न ही उन्हें कोई ‘अल्टीमेटम’ दिया गया है। इसके विपरीत, उच्चतम न्यायालय ने कुलाधिपति को उचित निर्णय लेने की पूरी छूट दी है।”